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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| यतः एवं महाशाला महाश्रोत्रिया ब्राह्मणाः सन्तो महाशालत्वाद्यभिमानं हित्वा समिद्धारहस्ता जातितो हीनं राजानं विद्यार्थिनो विनयेनोपजग्मुः, तथान्यैर्विद्योपादित्सुभिर्भवितव्यम् । तेभ्यश्चादाद्विद्यामनुपनीयैवोपनयनमकृत्वैव । तान्यथा योग्येभ्यो विद्यामदात्तथान्येनापि विद्या दातव्येत्याख्यायिकार्थः । एतद्वैश्वानरविज्ञानमुवाचेति वक्ष्यमाणेन संबन्धः ॥ ७ ॥ | क्योंकि इस प्रकार महागृहस्थ और परमश्रोत्रिय ब्राह्मण होनेपर भी वे महागृहस्थत्व आदिके अभिमानको छोड़कर हाथोंमें समिधाएँ ले विद्यार्थी बन अपनेसे हीन जातिवाले राजाके पास विनयपूर्वक गये थे इसलिये विद्योपार्जनकी इच्छावाले अन्य पुरुषोंको भी ऐसा ही होना चाहिये । तब राजाने उनका उपनयन न करके ही उन्हें विद्या दे दी । अतः इस आख्यायिकाका यही तात्पर्य है कि जिस प्रकार उन योग्य विद्यार्थियोंको राजाने विद्या दी थी उसी प्रकार दूसरोंको भी विद्यादान करना चाहिये । [ मूलके ‘एतत्’ शब्दका ] ‘एतद् वैश्वानरविज्ञानम् उवाच’ इस प्रकार आगे कहे जानेवाले वैश्वानरविज्ञानसे सम्बन्ध है ॥ ७ ॥ |

—:०:—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

द्वादश खण्ड

अश्वपति और औपमन्यवका संवाद

स कथमुवाच ? इत्याह—उसने किस प्रकार उपदेश दिया ? सो बतलाते हैं—

औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति। दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥

[ राजा— ] 'हे उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' 'हे पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [ राजा— ] 'तुम जिस आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही, 'सुतेजा' नामसे प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे कुलमें सुत, प्रसुत और आसुत दिखायी देते हैं' ॥ १ ॥

| औपमन्यव हे कमात्मानं वै वैश्वानरं त्वमुपास्स इति पप्रच्छ । | 'हे औपमन्यव ! तुम किस वैश्वानर आत्माकी उपासना करते हो ?' ऐसा राजाने पूछा । |
| नन्वयमन्याय आचार्यः सन्-ञ्शिष्यं पृच्छतीति । | शङ्का—किंतु आचार्य होकर भी शिष्यसे पूछता है—यह तो अनुचित है । |
| नैष दोषः; 'यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामि' | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि 'जो कुछ तू जानता है उसे बतलाकर तू मेरे प्रति उपसन्न हो; तब उससे आगे मैं |