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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

९३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ८

९३०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ८
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
स दृष्टान्तो यथा प्रयोग्यः प्रयोग्यपरो वा सशब्दः। प्रयुज्यत इति प्रयोग्योऽश्वो बलीवर्दो वा। यथा लोक आचरत्यनेनेत्याचरणो रथोऽनो वा तस्मिन्नाचरणे युक्तस्तदाकर्षणाय। एवमस्मिञ्छरीरे रथस्थानीये प्राणः पञ्चवृत्तिरिन्द्रियमनोबुद्धिसंयुक्तः प्रज्ञात्मा विज्ञानक्रियाशक्तिद्वयसंमूर्च्छितात्मा युक्तः स्वकर्मफलोपभोगनिमित्तं नियुक्तः। 'कस्मिन्वहमूत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि' इतीश्वरेण राजेव सर्वाधिकारी दर्शनश्रवणचेष्टान्यापारेऽधिकृतः। तस्यैव तु मात्रैकदेशश्चक्षुरिन्द्रियं रूपोपलब्धिद्वारभूतम्॥ ३॥वह दृष्टान्त यों है, जिस प्रकार प्रयोग्य अथवा 'स यथा प्रयोग्यः' इस पदसमूहमें 'सः' शब्द प्रयोग्यपरक है। जो प्रयुक्त होता है वह अश्व या वृषभ प्रयोग्य कहलाता है। वह जिस प्रकार लोकमें—जिसके द्वारा सब ओर जाते हैं वह रथ या गाड़ी आचरण कहलाता है उस आचरणमें उसे खींचनेके लिये [अश्व या वृषभ ] जुता रहता है, इसी प्रकार इस रथस्थानीय शरीरमें पाँच वृत्तियोंवाला प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे संयुक्त हुआ प्रज्ञात्मा विज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति इन दो शक्तियोंसे संयुक्त है, अर्थात् अपने कर्मफलके उपभोगके लिये नियुक्त है। 'किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमण करूँगा और किसके स्थित होनेपर मैं स्थित रहूँगा' इस श्रुतिके अनुसार, राजा जिस प्रकार सर्वाधिकारीको नियुक्त करता है उसी प्रकार ईश्वरने दर्शन, श्रवण और चेष्टा आदि व्यापारमें प्राणको अधिकारी बनाया है। रूपकी उपलब्धिका द्वारभूत चक्षु इन्द्रिय उसीकी मात्रा अर्थात् एक देश है॥ ३॥

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९११


अथ यत्रैतदाकाशमनुविषष्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदँशृणवानोति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥

जिसमें यह चक्षुद्वारा उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है; उसके रूपग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ वह आत्मा है; उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है और जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूँ वही आत्मा है; उसके शब्दोच्चारणके लिये वागिन्द्रिय है तथा जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ, वह भी आत्मा है, श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है ॥ ४ ॥


भाष्यम्भाष्यार्थ
अथ यत्र कृष्णतारोपलक्षित-<br>माकाशं देहच्छिद्रमनुविषष्णम-<br>नुषक्तमनुगतं तत्र स प्रकृतो-<br>ऽशरीर आत्मा चाक्षुषश्चक्षुषि भव<br>इति चाक्षुषस्तस्य दर्शनाय रूपो-<br>पलब्धये चक्षुः करणम्; यस्य तद्दे-<br>हादिभिः संहतत्वात्परस्य द्रष्टुरर्थे,<br>सोऽत्र चक्षुषि दर्शनेन लिङ्गेन<br>दृश्यते परोऽशरीरोऽसंहतः।जहाँ (जिस जाग्रदवस्था में) यह कृष्णतारोपलक्षित आकाश देहान्तर्वर्ती छिद्रमें अनुविषष्ण—अनुषक्त अर्थात् अनुगत है उस अवस्थामें यह प्रकृत अशरीर आत्मा चाक्षुष—चक्षुमें रहनेवाला है इसलिये चाक्षुष है। उसके देखने—रूपोपलब्धि करनेके लिये चक्षु करण है। देहादिसे संहत होनेके कारण जिसपर द्रष्टाके लिये चक्षु यह करण है वह पर अशरीर आत्मा इस नेत्रके अन्तर्गत दर्शनरूप लिङ्गसे उससे असंहत देखा जाता

छा० उ० ३०—