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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

४७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


राजन्मानुषं वित्तंयामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्ता-
मेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव ॥ ६ ॥

तब वह गौतम राजाके स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [ दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही राजाके सभामें पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। उसने उससे कहा—'हे भगवान् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये।' उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें; आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात [ प्रश्नरूपसे ] कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह संकटमें पड़ गया ॥ ६ ॥

स ह गौतमो गोत्रतः, राज्ञो जैवलेरर्धं स्थानमेयायागतवान् । तस्मै ह गौतमाय प्राप्तायार्हाम-र्हणां चकार कृतवान् । स च गौतमः कृतातिथ्य उषित्वा परेद्युः प्रातःकाले सभागे सभां गते राज्ञ्युदेयाय । भजनं भागः पूजा सेवा सह भागेन वर्तमानो वा सभागः पूज्यमानोऽन्यैः स्वयं गौतम उदेयाय राजान-मुद्गतवान् ।<br><br>तं होवाच गौतमं राजा—मानुषंस्य भगवन्गौतम मनुष्य-सम्बन्धिनो वित्तस्य ग्रामादेर्वरं वरणीयं कामं वृणीथाःप्रार्थयेथाः।वह गौतम-गोत्रोत्पन्न मुनि राजा जैवलिके स्थानपर आया । अपने यहाँ आये हुए उस गौतमकी उसने अर्हा-पूजा की । इस प्रकार आतिथ्यसत्कारसे सत्कृत वह गौतम उस दिन निवास कर दूसरे दिन सबेरे ही राजाके सभागत होने--सभामें पहुँचनेपर उसके समीप गया । अथवा [ 'सभागः' पाठ मानकर ऐसा अर्थ हो सकता है-] भाग-भजन अर्थात् पूजा-सेवाको कहते हैं जो भागसे युक्त अर्थात् दूसरेसे पूजित था वह गौतम स्वयं राजाके पास गया ।<br><br>उस गौतमसे राजाने कहा--'हे भगवन् ! आप मनुष्यसम्बन्धी ग्रामादि धनका वरण करने योग्य वर इच्छानुसार माँग लीजिये।'

खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ४७९


| स होवाच गौतमः—तवैव तिष्ठतु राजन्मानुष वित्तम्; यामेव कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे वाचं पञ्चप्रश्नलक्षणामभाषथा उक्तवानसि तामेव वाचं मे मह्यं ब्रूहि कथयेत्युक्तो गौतमेन राजा सह कृच्छ्री दुःखी बभूव—कथं न्विदामिति ॥६॥ | उस गौतमने कहा—‘हे राजन् ! यह मनुष्यसम्बन्धी धन तुम्हारे ही पास रहे । तुमने कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके प्रति जो पाँच प्रश्नरूप बात कही थी वही मुझसे कहो । गौतमके इस प्रकार कहनेपर वह राजा यह कहता हुआ कि ‘यह कैसे हो सकता है?’ कृच्छ्री --दुखी हो गया ॥ ६ ॥ |

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प्रवाहणका वरप्रदान

| स ह कृच्छ्रीभूतोऽप्रत्याख्येयं ब्राह्मणं मन्वानो न्यायेन विद्या वक्तव्येति मत्वा— | इस प्रकार दुखी हुए उस राजाने ‘ब्राह्मणका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये’ यह मानते हुए तथा ‘विद्याका नियमानुसार ही उपदेश करना चाहिये’ यह समझते हुए— |

तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तꣳहोवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥

उसे ‘यहाँ चिरकालतक रहो’ ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—‘हे गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला—॥ ७ ॥

| तं ह गौतमं चिरं दीर्घकालं वसेत्येवमाज्ञापयाञ्चकाराज्ञप्तवान्। यत्पूर्वं प्रत्याख्यातवान्राजा | उस गौतमको उसने 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी । राजाने पहले जो विद्याका प्रत्या- |