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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

९०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है'--ऐसा प्रजापतिने कहा 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। आत्मा इससे भिन्न नहीं है। अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो।' उन्होंने पाँच वर्ष और वहीं निवास किया। ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये। इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया। तब उनसे प्रजापतिने कहा ॥ ३ ॥

एवमेवेत्युक्त्वा यो मयोक्त-'यह बात ऐसी ही है' ऐसा
स्त्रिभिः पर्यायैस्तमेवैतं नो एवा-कहकर 'मैंने तीन पर्यायोंमें जिसका वर्णन किया था उसी इस आत्मा-
न्यत्रैतस्मादात्मनोऽन्यं कञ्चनकी-इस आत्मासे भिन्न किसी
किं तर्ह्येतमेव व्याख्यास्यामि।अन्य आत्माकी नहीं, तो किसकी? इसी आत्माकी मैं व्याख्या करूँगा।
स्वल्पस्तु दोषस्तवावशिष्टस्त-अभी तुम्हारा थोड़ा-सा दोष शेष
त्क्षपणाय वसापराण्यन्यानिहै। उसकी निवृत्तिके लिये अन्य
पञ्च वर्षाणीत्युक्तः स तथापाँच वर्ष और रहो' ऐसा कहे जानेपर इन्द्रने वैसा ही किया।
चकार। तस्मै मृदितकषायादि-इस प्रकार जिनके कषायादि दोष
दोषाय स्थानत्रयदोषसम्बन्ध-नष्ट हो गये हैं उन इन्द्रदेवके प्रति प्रजापतिने जाग्रदादि तीनों
रहितमात्मनः स्वरूपमपहत-स्थानोंके दोषोंके सम्बन्धमें रहित
पाप्मत्वादिलक्षणं मघवते तस्मैआत्माका अपहतपाप्मत्वादि लक्षण-
होवाच।वाला स्वरूप निरूपण किया।
तान्येकशतं वर्षाणि सम्पेदुःवे सब एक और सौ वर्ष हो गये।
सम्पन्नानि बभूवुः। यदाहुर्लोकेइसीसे लोकमें शिष्टजन ऐसा कहते

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५


| शिष्टा एकशतं ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवासेति । तदेतद्द्वात्रिंशतमित्यादिना दर्शितमित्याख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुत्योच्यते । एवं किलैतदिन्द्रत्वादपि गुरुतरमिन्द्रेणापि महता यत्नेनैकोत्तरवर्षशतकृतायासेन प्राप्तमात्मज्ञानमतो नातः परं पुरुषार्थान्तरमस्तीत्यात्मज्ञानं स्तौति ॥ ३ ॥ | हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया। यह बात 'द्वात्रिंशतम्' इत्यादि वाक्योंसे कही गयी है, अतः श्रुतिने आख्यायिकासे कुछ हटकर इसे स्वयं भी कह दिया है। इस प्रकार जो इन्द्रत्वसे भी गुरुतर है ऐसे इस आत्मज्ञानको इन्द्रने भी एक सौ एक वर्षतक किये हुए परिश्रमसे बड़े यत्नपूर्वक प्राप्त किया था, अतः इससे बढ़कर और कोई पुरुषार्थ नहीं है—इस प्रकार श्रुति आत्मज्ञानकी स्तुति करती है ॥ ३ ॥ |

-: ० :-

इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये एकादशखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

द्वादश खण्ड

मर्त्यशरीर आदिका उपदेश

मघवन्मर्त्यं वा इदँशरीरमात्तं मृत्युना तदस्या-
मृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रिया-
प्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहति-
रस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः॥ १ ॥

हे इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है; यह मृत्युसे ग्रस्त है। यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है; सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होनेपर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते ॥ १ ॥

| मघवन्मर्त्यं वै मरणधर्मीदं शरीरम्। यन्मन्यसेऽक्ष्याधारादिलक्षणः सम्प्रसादलक्षण आत्मा मयोक्तो विनाशमेवापीतो भवतीति। शृणु तत्र कारणम्। यदिदं शरीरं वै यत्पश्यसि तदेतन्मर्त्यं विनाशि। तच्चात्तं मृत्युना ग्रस्तं सततमेव। कदाचिदेव म्रियत इति मर्त्यमित्युक्ते न तथा | हे इन्द्र ! यह शरीर निश्चय ही मर्त्य—मरणधर्मी है। तुम जो ऐसा समझते हो कि मेरा बतलाया हुआ नेत्रादिका आधारभूत सम्प्रसादरूप आत्मा विनाशको ही प्राप्त हो जाता है, सो उसका कारण सुनो। तुम जो यह शरीर देखते हो वह यह शरीर मर्त्य—नाशवान् है—यह मृत्युसे आत्त अर्थात् सर्वदा ही ग्रस्त है। कभी-कभी ही मरता है, इसलिये यह मर्त्य है—ऐसा कहनेपर इतना भय नहीं |

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
संत्रासो भवति यथा ग्रस्तमेव सदा व्याप्तमेव मृत्युनेत्युक्त इति वैराग्यार्थं विशेष इत्युच्यत आत्तं मृत्युनेति । कथं नाम देहाभिमानतो विरक्तः सन्निवर्तत इति । शरीरमप्यत्र सहेन्द्रियमनोभिरुच्यते ।होता जितना कि ‘मृत्युसे ग्रस्त अर्थात् सर्वदा व्याप्त ही है’ ऐसा कहनेपर होता है। अतः वैराग्यके लिये विशेषरूपसे कहनेके लिये यह कहा गया है कि यह मृत्युसे व्याप्त है; जिससे कि किसी-न-किसी तरह यह देहाभिमानसे विरक्त होकर निवृत्तिपरायण हो जाय। यहाँ शरीर भी इन्द्रिय और मनके सहित कहा गया है।
तच्छरीरमस्य सम्प्रसादस्य त्रिस्थानतया गम्यमानस्यामृतस्य मरणादिदेहेन्द्रियमनोधर्मवर्जितस्येत्येतत् । अमृतस्येत्यनेनैवाशरीरत्वे सिद्धे पुनरशरीरस्येति वचनं वाय्वादिवत्सावयवत्वमूर्त्तिमत्त्वे मा भूतामिति । आत्मनो भोगाधिष्ठानम् । आत्मनो वा सत ईक्षितुस्तेजोऽबन्नादिक्रमेणात्पनमधिष्ठानम् । जीवरूपेण प्रविश्यवह शरीर जाग्रदादि तीन स्थानोंके सम्बन्धसे विदित होनेवाले इस अमृत—देह, इन्द्रिय और मनके मरणादि-धर्मोंसे रहित सम्प्रसादका [ अधिष्ठान है ]। आत्माका अशरीरत्व तो ‘अमृतस्य’ इस पदसे ही सिद्ध होता है; किंतु फिर भी ‘अशरीरस्य’ ऐसा जो कहा गया है वह इसलिये है कि वायु आदिके समान आत्माके सावयवत्व और अमूर्त्तिमत्त्वका प्रसंग न हो जाय। उस आत्माका यह भोगाधिष्ठान है। अथवा आत्मासे—ईक्षण करनेवाले सत्-से तेज, अप् और अन्नादि क्रमसे उत्पन्न हुआ ‘अधिष्ठान’ (उस अपने उत्पादककी उपलब्धिका अधिकरण) है;