छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| कर्मबीजस्य ब्रह्मविद्याहुताशादाहनिमित्तमित्यवोचाम षष्ठ एव तदिहापि प्रत्येत्तव्यम् ।<br><br>यदैवं सुप्तः सौरेण तेजसा हि नाड्यन्तर्गतेन सर्वतः सम्पन्नो व्याप्तो भवति । अतो विशेषेण चक्षुरादिनाडीद्वारैर्बाह्यविषयभोगायाप्रसृतानि करणान्यस्य तदा भवन्ति । तस्मादयं करणानां निरोधात्स्वात्मन्येवावस्थितःस्वप्नं न विजानातीति युक्तम् ॥ ३ ॥ | ब्रह्मविद्यारूप अग्निसे दग्ध न होनेके कारण ही रहता है—ऐसा हम छठे अध्यायमें ही कह चुके हैं, उसीपर यहाँ भी विश्वास करना चाहिये।<br><br>जिस समय यह जीव इस प्रकार सो जाता है उस समय सब ओरसे नाडीके अन्तर्गत और तेजसे सम्पन्न—व्याप्त हो जाता है इसलिये तब इसकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंके भोगके लिये चक्षु आदि नाड़ियोंके द्वारा विशेषरूपसे अप्रसृत अर्थात् निरुद्ध हो जाती हैं। इसीसे इन्द्रियोंका निरोध हो जानेके कारण अपने स्वरूपमें ही स्थित हुआ यह जीव स्वप्न नहीं देखता ॥ ३ ॥ |
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| तत्रैवं सति— | ऐसा होनेपर— |
अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥
अब, जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता है उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते हैं—'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ? वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता तबतक उन्हें जानता है ॥ ४ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६१
| अथ यत्र यस्मिन् कालेऽबलिमानमबलभावं देहस्य रोगादिनिमित्तं जरादिनिमित्तं वा कृशीभावमेतन्नयनं नीतः प्रापितो देवदत्तो भवति मुमूर्षुर्यदा भवतीत्यर्थः, तमभितः सर्वतो वेष्टयित्वासीना ज्ञातय आहुर्जानासि मां तव पुत्रं जानासि मां पितरं चेत्यादि । स मुमूर्षुर्यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तोऽनिर्गतो भवति तावत्पुत्रादीञ्जानाति ॥ ४ ॥ | अब, जिस समय यह देवदत्त [ नामक पुरुषविशेष ] अबलिमान् रोगादिके कारण अथवा जरादिके कारण देहकी दुर्बलता—कृशताको प्राप्त करा दिया जाता है अर्थात् जिस समय यह मरणासन्न होता है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए बन्धुजन कहते हैं—‘क्या तुम मुझ अपने पुत्रको जानते हो ? क्या तुम मुझ अपने पिताको पहचानते हो ?’ इत्यादि । वह मुमूर्षु जीव जबतक इस शरीरसे अनुत्क्रान्त रहता है अर्थात् बहिर्गत नहीं होता तबतक उन पुत्रादिको पहचानता है ॥ ४ ॥ |
अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभि-
रूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षि-
प्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं
विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥
फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह ‘ॐ’ ऐसा [ कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ ] ऊर्ध्वलोक अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है ॥ ५ ॥