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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १

६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १


समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयममुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥

यह [प्राण] और [सूर्य] परस्पर समान ही हैं। यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है। इस [प्राण] को 'स्वर' ऐसा कहते हैं और उस [सूर्य] को 'स्वर' एवं प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं। अतः इस [प्राण] और उस [सूर्य] रूपसे उद्गीथकी उपासना करे ॥ २ ॥

| समान उ एव तुल्य एव प्राणः सवित्रा गुणतः, सविता च प्राणेन। यस्मादुष्णोऽयं प्राण उष्णश्चासौ सविता किं च स्वर इतीमं प्राणमाचक्षते कथयन्ति, तथा स्वर इति प्रत्यास्वर इति चामुं सवितारम्। यस्मात्प्राणः स्वरत्येव न पुनर्मृतः प्रत्यागच्छति, सविता त्वस्तमित्वा पुनरप्यहन्यहनि प्रत्यागच्छति; अतः प्रत्यास्वरः। अस्माद्गुणतो नामतश्च समानावितरेतरं प्राणादित्यौ। अतः तत्त्वाभेदादेतं प्राणमिमममुं चादित्यमुद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | गुणदृष्टिसे प्राण सूर्यके सदृश ही है तथा सूर्य प्राणके सदृश है, क्योंकि यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है तथा इस प्राणको 'स्वर' ऐसा कहकर पुकारते हैं और उस सूर्यको भी 'स्वर' एवं 'प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं, क्योंकि प्राण तो केवल स्वररण (गमन) ही करता है—मरनेके पश्चात् वह पुनः लौटता नहीं; किंतु सूर्य प्रतिदिन अस्तमित हो-होकर लौट आता है, इसलिये वह प्रत्यास्वर है। इस प्रकार गुण और नामसे भी ये प्राण और आदित्य एक-दूसरेके तुल्य ही हैं। अतः तत्त्वतः अभेद होनेके कारण इस प्राण और उस सूर्यरूपसे उद्गीथकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) उपासना करे ॥ २ ॥ |

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


व्यानदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः। अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः स वाक्। तस्मादप्राणन्नपानन्वाचमभिव्याहरति ॥ ३ ॥

तदनन्तर दूसरे प्रकारसे [अध्यात्मोपासना कही जाती है—] व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे। पुरुष जो प्राणन करता है (मुख या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है) वह प्राण है और जो अपश्वास लेता है (वायुको भीतरकी ओर खींचता है) वह अपान है। तथा प्राण और अपानकी जो सन्धि है वही व्यान है। जो व्यान है वही वाक् है। इसीसे पुरुष प्राण और अपान क्रिया न करते हुए ही वाणी बोलता है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ खल्विति प्रकारान्तरेणोपासनमुद्गीथस्योच्यते; व्यानमेव वक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्यैव वृत्तिविशेषमुद्गीथमुपासीत। अधुना तस्य तत्त्वं निरूप्यते—यद्वै पुरुषः प्राणिति मुखनासिकाभ्यां वायुं बहिर्निःसारयति, स प्राणाख्यो वायोर्वृत्तिविशेषः, यदपानित्यपश्वसिति ताभ्यामेवान्तराकर्षति वायुं सोऽपानोऽपानाख्या वृत्तिः।‘अथ खलु’—अब प्रकारान्तरसे उद्गीथकी उपासना कही जाती है। प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त व्यान है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे। अब उसके तत्त्वका निरूपण किया जाता है। पुरुष जो प्राणन करता है अर्थात् मुख और नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है, वह वायुका प्राण नामक वृत्तिविशेष है; तथा वह जो अपश्वास करता है, अर्थात् उन (मुख और नासिका) के ही द्वारा वायुको भीतर खींचता है वह उसकी अपानसंज्ञक वृत्ति है।

छा० उ० ३—