छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| १६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
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| फलम्— | इस उपासनाका फल— |
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भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष पशुओंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुधनसे सम्पन्न होता है ॥२॥
| भवन्ति हास्य पशवः, पशुमान्भवति पशुफलैश्च भोग-त्यागादिभिर्युज्यत इत्यर्थः॥२॥ | उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुमान् होता है अर्थात् वह पशुओंसे प्राप्त होनेवाले फल-भोग एवं दानादिसे युक्त होता है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
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प्राणविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयाꣳसि वा एतानि ॥ १ ॥
प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) गुणविशिष्ट सामकी उपासना करे। [उनमें] प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही परोवरीय (उत्तरोत्तर श्रेष्ठ) हैं ॥ १ ॥
| प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत । परं परं वरीयस्त्वगुणवत्प्राणदृष्टिविशिष्टं सामोपासीतेत्यर्थः । प्राणो घ्राणं हिंकारः, उत्तरोत्तरवरीयसां प्राथम्यात् । वाक्प्रस्तावः, वाचा हि प्रस्तूयते सर्वम्, वाग्वरीयसी घ्राणात्, अप्राप्तमप्युच्यते वाचा, प्राप्तस्यैव तु गन्धस्य ग्राहकः प्राणः । | प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय सामकी उपासना करे अर्थात् उत्तरोत्तर श्रेष्ठत्वगुणवान् प्राणदृष्टियुक्त सामकी उपासना करे। उन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ प्राणोंमें प्रथम होनेके कारण प्राण—घ्राणेन्द्रिय हिंकार है। वाणी प्रस्ताव है, क्योंकि वाणीसे ही सबका प्रस्ताव किया जाता है। वाणी प्राणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है, [क्योंकि] वाणीसे अप्राप्त वस्तुका भी निरूपण किया जाता है और प्राण केवल प्राप्त हुए गन्धका ही ग्रहण करनेवाला है। |