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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |

१०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
स्यात् । किं ततोऽल्पतरे खे यद्द्भवेदित्याहुः । दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते न किञ्चन विद्यत इत्यभिप्रायः । <br><br> यदि नाम बदरमात्रं किमपि विद्यते किं तस्यान्वेषणेन विजिज्ञासनेन वा फलं विजिज्ञासितुः स्यात् ? अतो यत्तत्रान्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं वा न तेन प्रयोजनमित्युक्तवतः स आचार्यो ब्रूयादिति श्रुतेर्वचनम् ॥ २ ॥अल्पतर आकाशमें जो हो ऐसी क्या वस्तु हो सकती है ?--इस प्रकार यदि वे पूछें। अभिप्राय यह है कि इस हृदयपुण्डरीकके भीतर जो आकाश है वह सूक्ष्म है, उसमें क्या वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कुछ भी नहीं हो सकती। <br><br> यदि बेरके समान कोई वस्तु हो भी तो उसकी खोज अथवा जिज्ञासा करनेसे जिज्ञासुको फल भी क्या होगा ? अतः वहाँ जो खोज करने योग्य अथवा जिज्ञासा करने योग्य वस्तु है उससे हमें कोई प्रयोजन नहीं है तो इस प्रकार कहनेवाले शिष्योंसे आचार्यको इस प्रकार कहना चाहिये—यह श्रुतिका वाक्य है ॥ २ ॥
शृणुत, तत्र यद्ब्रूथ पुण्डरीकान्तःखस्याल्पत्वात्तत्स्थमल्पतरं स्यादिति, तदसत् । न हि खं पुण्डरीकवेश्मगतं पुण्डरीकादल्पतरं मत्वावोचं दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इति । किन्तर्हि ? पुण्डरीकमल्पं तदनुविधायिसुनो, इस विषयमें तुम जो कहते हो कि हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाश सूक्ष्म होनेके कारण उसका अन्तर्वर्ती ब्रह्म और भी सूक्ष्म होगा, वह ठीक नहीं। मैंने हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशको हृदयकमलसे सूक्ष्मतर मानकर यह नहीं कहा कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश सूक्ष्म है। तो क्या बात है ?—हृदयकमल सूक्ष्म है उसका अनुवर्तन

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०९


| तत्स्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश- | करनेवाला उसका अन्तर्वर्ती अन्तः- |
| परिच्छिन्नं तस्मिन्विशुद्धे संहृत- | करण उस पुण्डरीकाकाशसे परि- |
| करणानां योगिनां स्वच्छ इवो- | च्छिन्न है। जिन्होंने अपनी इन्द्रि- |
| दके प्रतिबिम्बरूपमादर्श इव च | योंका उपसंहार कर लिया है उन |
| शुद्धे स्वच्छं विज्ञानज्योतिः- | योगियोंको उस विशुद्ध अन्तःकरणमें |
| स्वरूपावभासं तावन्मात्रं ब्रह्मो- | जलमें प्रतिबिम्बके समान तथा |
| पलभ्यत इति दहरोऽस्मिन्नन्तरा- | स्वच्छ दर्पणमें रूपके समान विशुद्ध |
| काश इत्यवोचामान्तःकरणोपा- | विज्ञानज्योतिःस्वरूपसे प्रतीत होने- |
| धिनिमित्तम्; स्वतस्तु-- | वाला ब्रह्म उसीके बराबर उपलब्ध |
| | होता है। इसीसे अन्तःकरणरूप |
| | उपाधिके कारण हमने यह कहा |
| | था कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश |
| | अन्तःकरणरूप उपाधिके कारण |
| | सूक्ष्म है; स्वयं तो— |

यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥

जितना यह [ भौतिक ] आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी—ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु—ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एवं इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥