छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अथ यत्प्रथमास्तमितेऽदर्शनं जिगमिषति सवितरि तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निदधति पितृपितामहप्रपितामहरूपेण दर्भेषु निक्षिपन्ति तांस्तदर्थं पिण्डान्वा स्थापयन्ति । निधनसंबन्धान्निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्नः पितरः। एवमवयवशः सप्तधा विभक्तं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते यस्तस्य तदापत्तिः फलमिति वाक्यशेषः ॥ ८ ॥ | तथा सूर्यास्तसे पूर्व अर्थात् सूर्य जब अदृश्य होना चाहता है उस समय उसका जो रूप है वह निधन है। उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं। इसीसे उन्हें निहित करते हैं अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामहरूपसे उन्हें दर्भोंपर स्थापित करते हैं अथवा उनके उद्देश्यसे पिण्ड रखते हैं । इस प्रकार निधनका सम्बन्ध होनेके कारण वे पितृगण इस सामकी निधनभक्तिके पात्र हैं । इस प्रकार अवयवरूपसे सात भागोंमें विभक्त हुए इस आदित्यरूप सप्तविध सामकी जो उपासना करता है उसे आदित्यरूपताकी प्राप्ति होनारूप फल मिलता है—यह वाक्यशेष है ॥८॥ |
<br>इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना
| मृत्युरादित्यः अहोरात्रादि-कालेन जगतः प्रमापयितृत्वा-त्तस्यातितरणायेदं सामोपासन-मुपदिश्यते— | दिवस और रात्रि आदि कालके द्वारा जगत्का प्रमापयिता [ अर्थात् वधकर्ता ] होनेके कारण आदित्य मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये इस सामोपासनाका उपदेश किया जाता है— |
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधꣳसामो-
पासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं
तत्समम् ॥ १ ॥
अब [ यह बतलाया जाता है कि ] समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करे। 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है ॥ १ ॥
| अथ खल्वनन्तरमादित्य-मृत्युविषयसामोपासनस्यात्मसं-मितं स्वावयवतुल्यतया मितं परमात्मतुल्यतया वा संमित-मतिमृत्यु मृत्युजयहेतुत्वात् । | अब निश्चय ही आदित्यरूप मृत्यु-के विषयभूत सामकी उपासनाके पश्चात् आत्मसंमित—अपने अवयवों ( सामावयवों ) की तुल्यताद्वारा परिमिति अथवा परमात्मसदृशताके कारण ज्ञात, जो मृत्युको जीतनेका हेतु होनेके कारण अतिमृत्यु है, [ उस सप्तविध सामकी उपासना |