छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ते श्वानस्तत्रैवागम्य ऋषेः समक्षं यथैवेह कर्माणि बहिष्पवमानेन स्तोत्रेण स्तोष्यमाणा उद्गातृपुरुषाः संरब्धाः संलग्ना अन्योन्यमेन मुखेनान्योन्यस्य पुच्छं गृहीत्वा ससृपुरासृप्तवन्तः परिभ्रमणं कृतवन्त इत्यर्थः । त एवं संसृप्य समुपविश्योपविष्टाः सन्तो हिं चक्रुर्हिंकारं कृतवन्तः ॥ ४ ॥ | उन कुत्तोंने वहाँ उस ऋषिके सम्मुख आकर, जिस प्रकार कर्ममें बहिष्पवमान स्तोत्रसे स्तवन करनेवाले उद्गातालोग एक-दूसरेसे मिलकर चलते हैं उसी प्रकार मुँहसे एक-दूसरेकी पूँछ पकड़कर सर्पण–परिश्रमण किया । उन्होंने इस प्रकार परिश्रमण कर फिर वहाँ बैठकर हिंकार किया ॥ ४ ॥ |
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कुत्तोंद्वारा किया हुआ हिंकार
ओ ३ मदा ३ मों ३ पिबा ३ मों ३ देवो वरुणः प्रजापतिः सविता २ न्नमिहा २ हरदन्नपते ३ ऽन्नमिहा २ हरा २ हरो ३ मिति ॥ ५ ॥
ॐ हम खाते हैं, ॐ हम पीते हैं, ॐ देवता, वरुण, प्रजापति, सूर्यदेव यहाँ अन्न लावें। हे अन्नपते ! यहाँ अन्न लाओ, अन्न लाओ, ॐ ॥ ५ ॥
| ओमदामों पिबामों देवो द्योतनात्, वरुणो वर्षणाज्जगतः, प्रजापतिः पालनात्प्रजानाम्, सविता प्रसवितृत्वात्सर्वस्यादित्य उच्यते । एतैः पर्यायैः स एवंभूत आदित्योऽन्नमस्मभ्यमिहाहरदाहरत्विति । | ॐ हम खाते हैं, ॐ हम पीते हैं, ॐ। आदित्य ही द्योतनशील होनेके कारण देव, जगत्की वर्षा करनेके कारण वरुण, प्रजाओंका पालन करनेसे प्रजापति तथा सबका प्रसविता होनेके कारण सविता कहा जाता है । इन पर्यायोंके कारण ऐसे गुणोंवाले वे आदित्य हमारे लिये यहाँ अन्न लावें । |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
| त एवं हिं कृत्वा पुनरप्यूचुः— <br><br> स त्वं हेऽन्नपते ! स हि सर्वस्यान्नस्य प्रसवितृत्वात्पतिः । न हि तत्पाकेन विना प्रसूत मन्नमणुमात्रमपि जायते प्राणिनाम् । अतोऽन्नपतिः । हेऽन्नपतेऽन्नमस्मभ्यमिहाहराहरेति । अभ्यास आदरार्थः । ओमिति ॥ ५ ॥ | इस प्रकार हिंकार कर उन्होंने फिर भी कहा—‘वही तू हे अन्नपते ! —सम्पूर्ण अन्नका उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण वही अन्नपति है, क्योंकि उसके पाक बिना उत्पन्न हो जानेपर भी प्राणियोंके लिये अणुमात्र भी अन्न उत्पन्न नहीं होता, अतः वह अन्नपति है—हे अन्नपते ! तू हमारे लिये यहाँ अन्न ला।’ ‘आहर’ इस शब्दकी पुनरावृत्ति आदरके लिये है। ओमिति—[ यह पद उपासनाकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ] ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश खण्ड
सामावयवभूत स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाएँ
| भक्तिविषयोपासनं सामावयवसंबद्धमित्यतः सामावयवान्तरस्तोभाक्षरविषयाण्युपासनान्तराणि संहतान्युपदिश्यन्तेऽनन्तरं सामावयवसंबद्धत्वाविशेषात्— | सामभक्ति-विषयक उपासना सामावयवोंसे सम्बद्ध है । अतः यहाँसे आगे सामके एक अवयवमात्र स्तोभाक्षरविषयक अन्य संहत उपासनाओंका वर्णन किया जाता है, क्योंकि उनका भी सामावयवरूपसे [ सामभक्तिके साथ ] सम्बद्ध होना समान ही है— |
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अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकारः । आत्मेहकारोऽग्निरीकारः ॥ १ ॥
यह लोक ही हाउकार है, वायु हाइकार है, चन्द्रमा अथकार है, आत्मा इहकार है और अग्नि ईकार है ॥ १ ॥
| अयं वावायमेव लोको हाउकारः स्तोभो रथन्तरे साम्नि प्रसिद्धः । 'इयं वै रथन्तरम्' इत्यस्मात्संबन्धसामान्याद्धाउकारस्तोभोऽयं लोक इत्येवमुपासीत । वायुर्हाइकारः । वामदेव्ये साम्नि हाइकारः प्रसिद्धः । वाय्वप्संबन्धश्च वामदेव्यस्य साम्नो यानि | यह लोक ही रथन्तर साममें प्रसिद्ध हाउकार स्तोभ है । 'यही रथन्तर है' इस सम्बन्धसामान्यसे हाउकार स्तोभ ही यह लोक है-इस प्रकार उपासना करे । वायु हाइकार है; वामदेव्य साममें हाइकार स्तोभ प्रसिद्ध है । वायु और जलका सम्बन्ध ही वामदेव्य सामका मूल |
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४५
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| रिति । अस्मात् सामान्याद्वाइ-<br>कारं वायुदृष्ट्योपासीत ।<br><br>चन्द्रमा अथकारः । चन्द्र-<br>दृष्ट्याथकारमुपासीत । अन्ने हीदं<br>स्थितम् । अन्नात्मा चन्द्रः ।<br>थकाराकारसामान्याच्च । आत्मे-<br>हकारः । इहेति स्तोभः प्रत्यक्षो<br>ह्यात्मेहेति व्यपदिश्यते, इहेति<br>च स्तोभः, तत्सामान्यात् । अग्नि-<br>रीकारः । ईनिधनानि चाग्नेयानि<br>सर्वाणि सामानीत्यतस्तत्सामा-<br>न्यात् ॥ १ ॥ | है । अतः इस समानताके कारण हाइकार सामकी वायुदृष्टिसे उपा-<br>सना करनी चाहिये ।<br>चन्द्रमा अथकार है । अथकारकी उपासना चन्द्रदृष्टिसे करनी चाहिये, क्योंकि यह (चन्द्रमा) अन्नमें ही स्थित है । चन्द्रमा अन्नस्वरूप ही है । थकार और अकारमें समानता होनेके कारण भी [अन्नरूप चन्द्रमा-<br>की अथकाररूपसे उपासना करनी चाहिये ] आत्मा इहकार है; 'इह' यह [ एक प्रकारका ] स्तोभ होता है । प्रत्यक्ष ही आत्मा 'इह' ऐसा कहकर निर्देश किया जाता है और 'इह' ऐसा स्तोभ भी होता है, अतः उसकी समानताके कारण [ आत्मा इहकार है ] । अग्नि ईकार है । सम्पूर्ण आग्नेय साम 'ई' में समाप्त होनेवाले हैं । अतः उस सदृशताके कारण अग्नि ईकार है ॥ १ ॥ |
आदित्य ऊकारो निह्नव एकारो विश्वे देवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिंकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥ २ ॥
आदित्य ऊकार है, निह्नव एकार है, विश्वेदेव औहोयिकार हैं, प्रजापति हिंकार है तथा प्राण स्वर है, अन्न या है एवं विराट् वाक् है ॥ २ ॥