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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| भोग्यत्वात् । असति तु स्मरणे सदप्यसदेव, सत्त्वकार्याभावात् । नापि सत्त्वं स्मृत्यभावे शक्यमाकाशादीनामवगन्तुमित्यतः स्मरणस्याकाशाद्भूयस्त्वम् । <br><br> दृश्यते हि लोके स्मरणस्य भूयस्त्वं यस्मात्, तस्माद्यद्यपि समुदिता बहव एकस्मिन्नासीरन्नुपविशेयुः, ते तत्रासीना अन्योन्यभाषितमपि न स्मरन्तश्चेत्स्युः, नैव ते कञ्चन शब्दं शृणुयुः, तथा न मन्वीरन्, मन्तव्यं चेत्स्मरेयुस्तदा मन्वीरन्, स्मृत्यभावान्न मन्वीरन्; तथा न विजानीरन् । यदा वाव ते स्मरेयुर्मन्तव्यं विज्ञातव्यं श्रोतव्यं च, अथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् । तथा स्मरेण वै—मम पुत्रा एते—इति पुत्रान्विजानाति, स्मरेण पशून् । अतो | होते हैं, क्योंकि वे स्मृतिमान्‌के ही योग्य हैं । स्मृतिके न होनेपर तो विद्यमान वस्तु भी अविद्यमान ही है, क्योंकि उसकी सत्ताके कार्यका अभाव है । स्मृतिका अभाव होनेपर आकाशादिकी सत्ताका ज्ञान भी नहीं हो सकता । इसीसे स्मरणकी आकाशसे उत्कृष्टता है । <br><br> क्योंकि लोकमें स्मृतिकी उत्कृष्टता देखी जाती है, इसलिये यद्यपि बहुत-से लोग एक स्थानपर बैठे हों वे एक-दूसरेसे भाषण करते हुए भी, यदि स्मृतियुक्त नहीं होते तो कोई शब्द श्रवण नहीं कर सकते । इसी प्रकार मनन भी नहीं कर सकते । यदि वे मन्तव्य विषयका स्मरण करते तो मनन कर सकते थे, अतः स्मृतिका अभाव होनेके कारण मनन भी नहीं कर सकते और न जान ही सकते हैं । जिस समय वे मन्तव्य, विज्ञातव्य अथवा श्रोतव्य विषयका स्मरण करते हैं तभी उसे सुन सकते, मनन कर सकते और जान सकते हैं । इसी प्रकार स्मरण करनेसे ही 'ये मेरे पुत्र हैं' इस प्रकार पुत्रोंको जानते हैं और स्मरणसे ही पशुओंको । |

खण्ड ११]शाङ्करभाष्यार्थ७६३

भूयस्त्वात्स्मरमुपास्स्वेति ॥१॥अतः उत्कृष्ट होनेके कारण तुम स्मरणकी उपासना करो ॥ १ ॥
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—: ० :—

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स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद—] 'भगवन् ! क्या स्मरसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन करें' ॥२॥

उक्तार्थमन्यत् ॥२॥शेष सबका अर्थ पूर्वोक्तके समान है ॥ २ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥

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चतुर्दश खण्ड

—: ० :—

स्मरणसे आशाकी महत्ता

आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥

आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोककी कामना करता है। तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥

| आशा वाव स्मराद्भूयसी।<br><br>आशाप्राप्तवस्त्वाकाङ्क्षा, आशा तृष्णा काम इति यामाहुः पर्यायैः, सा च स्मराद्भूयसी।<br><br>कथम् ? आशया ह्यन्तःकरणस्थया स्मरति स्मर्तव्यम्। आशाविषयरूपं स्मरन्नसौ स्मरो भवत्यत आशेद्ध, आशयाभिवर्धितः स्मरभूतः स्मरन्नृगादीन्मन्त्रान- | आशा ही स्मरणसे बढ़कर है।<br><br>आशा--अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम आशा है; जिसका तृष्णा और काम इन पर्याय शब्दोंसे भी निरूपण किया जाता है। वह स्मरकी अपेक्षा बढ़कर है।<br><br>सो किस प्रकार ?—अन्तःकरणमें स्थित हुई आशासे ही मनुष्य स्मरणीय विषयका स्मरण करता है। आशाके विषयके रूपका स्मरण करनेसे यह स्मृतिको प्राप्त होता है। अतः आशासे दीप्त---आशासे वृद्धिको प्राप्त हुआ स्मृतिभूत वह स्मरण करता हुआ ऋगादि मन्त्रोंका |

खण्ड १४]
शाङ्करभाष्यार्थ
७६५


| धीतेऽधीत्य च तदर्थं ब्राह्मणेभ्यो विधींश्च श्रुत्वा कर्माणि कुरुते तत्फलाशयैव पुत्रांश्च पशूंश्च कर्मफलभूतानिच्छतेऽमिवाञ्छत्याशयैव तत्साधनान्यनुतिष्ठति । इमं च लोकमाशेद्ध एव स्मरँल्लोकसंग्रहहेतुभिरिच्छते । अमुं च लोकमाशेद्धः स्मरंस्तत्साधनानुष्ठानेनेच्छतेऽत आशारशनावबद्धं स्मराकाशादि नामपर्यन्तं जगच्चक्रीभूतं प्रतिप्राणि । अत आशायाः स्मरादपि भूयस्त्वमित्यत आशामुपास्स्व ॥ १ ॥ | अध्ययन करता है तथा उनका अध्ययन कर और ब्राह्मणोंके मुखसे उनका अर्थ एवं विधि श्रवण कर उनके फलकी आशासे ही कर्म करता है तथा कर्मके फलभूत पुत्र और पशुओंकी इच्छा-कामना करता है एवं आशासे ही उनके साधनोंका अनुष्ठान करता है। आशासे समृद्ध हुआ ही वह लोकसंग्रहरूप हेतुओंसे इस लोकका स्मरण करता हुआ इसको इच्छा करता है तथा आशासे समृद्ध हुआ ही वह परलोककी, उसके साधनोंका अनुष्ठान करते हुए इच्छा करता है । इस प्रकार आशारूप रस्सीसे बँधा हुआ यह स्मर एवं आकाशसे लेकर नामपर्यन्त जगत् प्रत्येक प्राणीमें चक्रकी भाँति घूम रहा है। इसलिये आशा स्मरकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट है; अतः तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥ |


स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशायास्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवन्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥