छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ५८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यथेदमुच्यते लोके पूर्वाह्णे घटादि सिसृक्षुणा कुलालेन मृत्पिण्डं प्रसारितमुपलभ्य ग्रामान्तरं गत्वा प्रत्यागतोऽपराह्णे तत्रैव घटशरावाद्यनेकभेदभिन्नं कार्यमुपलभ्य मृदेवेदं घटशरावादि केवलं पूर्वाह्णे आसीदिति तथेहाप्युच्यते सदेवेदमग्र आसीदिति । एकमेवेति, स्वकार्यपतितमन्यन्नास्तीत्येकमेवेत्युच्यते । अद्वितीयमिति, मृद्व्यतिरेकेण;मृदो यथान्यद्घटाद्याकारेण परिणमयितृकुलालादिनिमित्तकारणं दृष्टं तथा सद्व्यतिरेकेण सतः सहकारिकारणं द्वितीयं वस्त्वन्तरं प्राप्तं प्रतिषिध्यतेऽद्वितीयमिति, नास्य द्वितीयं वस्त्वन्तरं विद्यत इत्यद्वितीयम् । | जिस प्रकार लोकमें घटादि बनानेकी इच्छावाले कुम्हारद्वारा पूर्वाह्नमें मृत्तिकाके पिण्डको फैलाया हुआ देखकर कोई पुरुष किसी अन्य ग्राममें जाकर मध्याह्नोत्तरकालमें लौटनेपर उसी स्थानमें घट-शराव आदि अनेकों भेदोंवाले मृत्तिकाके कार्यको देखकर यह कहता है कि पूर्वाह्नमें ये घट-शरावादि केवल मृत्तिका ही थे उसी प्रकार यहाँ भी 'यह आरम्भमें केवल सत् ही था' ऐसा कहा जाता है। यह एक ही था; अर्थात् अपने कार्यवर्गमें पतित कोई दूसरा नहीं था, इसलिये 'एक ही था' ऐसा कहा जाता है। और अद्वितीय था; मृत्तिकासे अतिरिक्त [दूसरी वस्तु नहीं थी] जिस प्रकार मृत्तिकाको घटादि आकारमें परिणत करनेवाला कुलाल आदि निमित्तकारण देखा जाता है उसी प्रकार सत्से भिन्न सत्का सहकारी कारणरूप कोई अन्य पदार्थ प्राप्त होता है, उसका 'अद्वितीय था' ऐसा कहकर प्रतिषेध किया जाता है। अर्थात् इससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं थी, इसलिये यह अद्वितीय था। |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| ननु वैशेषिकपक्षेऽपि सत्सामानाधिकरण्यं सर्वस्योपपद्यते, द्रव्यगुणादिषु सच्छब्दबुद्ध्यनुवृत्तेः; सद्द्रव्यं सन्गुणः सत्कर्मेत्यादिदर्शनात् । | शङ्का— किंतु सत्के साथ सबका सामानाधिकरण्य तो वैशेषिक मतमें भी सम्भव है; क्योंकि द्रव्य एवं गुण आदिमें सत्-शब्द और सद्-बुद्धिकी अनुवृत्ति होती है; जैसा कि 'सद् द्रव्यम्' 'सन् गुणः' एवं 'सत् कर्म' इत्यादि प्रयोगोंमें देखा जाता है। |
| (वैशेषिककल्पितात् सतोऽत्र भेदप्रदर्शनम्)<br>सत्यमेवं स्यादिदानीम्, प्रागुत्पत्तेस्तु नैवेदं कार्यं सदेवासीदित्यभ्युपगम्यते वैशेषिकैः; प्रागुत्पत्तेः कार्यस्यासत्त्वाभ्युपगमात् । न चैकमेवं सदद्वितीयं प्रागुत्पत्तेरिच्छन्ति । तस्माद्वैशेषिकपरिकल्पितात्सतोऽन्यत्कारणमिदं सदुच्यते मृदादिदृष्टान्तेभ्यः । | समाधान— ठीक है, वर्तमान कालमें तो ऐसा ही है, किंतु उत्पत्तिसे पूर्व यह कार्य सत् ही था—ऐसा वैशेषिक मतावलम्बियोंको मान्य नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व वे कार्यका असत्त्व स्वीकार करते हैं। उत्पत्तिसे पूर्व एकमात्र अद्वितीय सत् ही था—ऐसा मानना उन्हें अभीष्ट नहीं है। अतः मृत्तिका आदिके दृष्टान्तोंसे यह वैशेषिकोंद्वारा परिकल्पित सत्की अपेक्षा अन्य सत् कारण बतलाया जाता है। |
| (वैनाशिकमतम्)<br>तत्र हैतस्मिन्प्रागुत्पत्तेर्वस्तुनिरूपण एके वैनाशिका आहुर्वस्तु निरूपयन्तोऽसत्सद्भावमात्रं प्रागुत्पत्तेरिदं जगदेकमेवाग्रेऽद्वितीयमासीदिति । सद्भावमात्रं हि प्रागुत्पत्तेस्तत्त्वं कल्पयन्ति | इस विषयमें अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व वस्तुका निरूपण करनेमें एक यानी वैनाशिक (बौद्ध) वस्तुका निरूपण करते हुए कहते हैं— 'उत्पत्ति से पूर्व आरम्भमें यह जगत् एक अद्वितीय असत् अर्थात् सत्का अभावमात्र ही था। बौद्ध लोग उत्पत्तिसे पूर्व सत्के अभावमात्रको |