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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

| ४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |

४२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अत एषा उ एवैषैव समृद्धि-<br><br>र्यदनुज्ञा; यानुज्ञा स समृद्धिस्त-<br><br>न्मूलत्वादनुज्ञायाः । समृद्धो<br><br>ह्योमित्यनुज्ञां ददाति । तस्मात्<br><br>समृद्धिगुणवानोङ्कार इत्यर्थः ।<br><br>समृद्धिगुणोपासकत्वात्तद्धर्मा सन् समर्धयिता ह वै कामानां यजमानस्य भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यादि पूर्ववत् ॥ ८ ॥ | अतः 'एषा उ एव' अर्थात् यही समृद्धि है। जो कि अनुज्ञा कहलाती है। जो अनुज्ञा है वही समृद्धि है, क्योंकि अनुज्ञा समृद्धिमूलक होती है। समृद्ध पुरुष ही 'ॐ' ऐसी अनुज्ञा देता है। अतः तात्पर्य यह है कि ओंकार समृद्धि गुणवाला है। जो ऐसा जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह समृद्धिगुणयुक्त वस्तुका उपासक होनेके कारण उसके ही समान धर्मवाला होकर अपने यजमानकी कामनाओंको समृद्ध (पूर्ण) करनेवाला होता है—इत्यादि पूर्ववत् जानना चाहिये ॥ ८ ॥ |

ओंकारकी स्तुति

| अथेदानीमक्षरं स्तौत्युपास्य-<br><br>त्वात्प्ररोचनार्थम्, कथम् ? | इसके बाद अब श्रुति उस अक्षर (ॐ) में रुचि उत्पन्न करनेके लिये उसकी स्तुति करती है, क्योंकि वह उपास्य है। कैसे स्तुति करती है, [ यह बताते हैं ]— |

तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्यो-<br>
मिति शꣳसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै<br>
महिम्ना रसेन ॥ ९ ॥

उस अक्षरसे ही यह [ऋग्वेदादिरूप] त्रयीविद्या प्रवृत्त होती है। 'ॐ' ऐसा कहकर ही [अध्वर्यु] आश्रावण कर्म करता है, 'ॐ' ऐसा कहकर ही होता शंसन करता है तथा 'ॐ' ऐसा कहकर ही उद्गाता उद्गान करता है। इस अक्षर [परमात्मा] की पूजाके लिये ही [सम्पूर्ण वैदिक कर्म हैं] तथा इसीकी महिमा और रस (व्रीहि-यवादि हवि) के द्वारा [सब कर्म प्रवृत्त होते हैं] ॥ ९ ॥

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४३
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयमृग्वेदा-<br>दिलक्षणा त्रयीविद्या त्रयी-<br>विद्याविहितं कर्मेत्यर्थः । न हि<br>त्रयीविद्यैवांश्रावणादिभिर्वर्तते ।<br>कर्म तु तथा प्रवर्तत इति प्रसि-<br>द्धम्। कथम् ? ओमित्याश्रावयत्यो-<br>मिति शंसत्योमित्युद्गायतीति<br>लिङ्गाच्च सोमयाग इति गम्यते ।<br>तच्च कर्मैतस्यैवाक्षरस्यापचि-<br>त्यै पूजार्थम् । परमात्मप्रतीकं<br>हि तत् । तदपचितिः परमात्मन<br>एव सा । “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य<br>सिद्धिं विन्दति मानवः” (गीता<br>१८ । ४६) इति स्मृतेः ।<br>किं चैतस्यैवाक्षरस्य महिम्ना<br>महत्त्वेन ऋत्विग्यजमानादि-उस प्रकृत अक्षरसे ही यह ऋग्वेदादिरूप त्रयीविद्या अर्थात् त्रयीविद्यासे विधान किया हुआ कर्म प्रवृत्त होता है, क्योंकि आश्रावण आदि कर्मोंद्वारा स्वयं त्रयीविद्या ही प्रवृत्त नहीं हुआ करती । हाँ, यह प्रसिद्ध ही है कि कर्म इस प्रकार प्रवृत्त हुआ करता है। किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] ॐ ऐसा कहकर [अध्वर्यु ] आश्रावण करता है, ॐ ऐसा कहकर [होता] शंसन करता है और ॐ ऐसा कहकर [उद्गाता] उद्गान करता है । इस प्रकार आश्रावण आदि तीनों कर्मोंके समाहाररूप लिङ्ग* (लक्षण) से जाना जाता है कि यह सोमयागका वर्णन है।<br>तथा वह कर्म भी इस अक्षरकी ही अपचिति—पूजाके लिये है, क्योंकि वह परमात्माका प्रतीक है, अतः उसकी पूजा परमात्माकी ही पूजा है; जैसा कि “अपने कर्मसे उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि लाभ करता है” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है ।<br>तथा इस अक्षरकी महिमा—महत्त्व, यानी ऋत्विज् एवं यजमान

* अध्वर्यु होता और उद्गाता—इन तीनोंके कर्मोंका समाहार दर्शपूर्णमास आदिमें सम्भव नहीं है । अग्निष्टोम आदि यज्ञोंमें ही जो सोमयागसंस्थाके अन्तर्गत हैं उसकी सम्भावना है । अतः यहाँ उक्त तीनों कार्योंके समाहाररूप लिंग ( लक्षण ) से यह सूचित होता है कि यहाँ ॐकारसे आरम्भ होनेवाले त्रयीविद्या-विहित कर्म-सोमयागका ही वर्णन है ।