छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तदा कृम्याद्यन्नमपि प्राणस्येति भक्ष्यत्वेन विहितं स्यात् । तुल्ययोर्विज्ञानार्थयोः प्रश्नप्रतिवचनयोः प्रकरणस्य विज्ञानार्थत्वादर्धजरतीयो न्यायो न युक्तः कल्पयितुम् । | लिया जाय तो कृमि आदि अन्नका भी प्राणके भक्ष्यरूपसे विधान समझा जायगा । इस प्रकार समानरूपसे विज्ञानार्थक प्रश्न और उत्तरोंका यह प्रकरण विज्ञानरूप प्रयोजनके लिये ही होनेके कारण यहाँ अर्धजरतीय न्यायकी* कल्पना करना उचित नहीं है । |
| यत्तु प्रसिद्धमाचमनं प्रायत्यार्थं प्राणस्यानग्नतार्थं च न भवतीत्युच्यते, न तथा वयमाचमनमुभयार्थं ब्रूमः; किं तर्हि ? प्रायत्यार्थाचमनसाधनभूता आपः प्राणस्य वास इति दर्शनं चोद्यत इति ब्रूमः । तत्राचमनस्योभयार्थत्वप्रसङ्गदोषचोदनानुपपन्ना । वासोऽर्थ एवाचमने तद्दर्शनं स्यादिति चेत् ? | तथा ऐसा जो कहा जाता है कि 'शुद्धिके लिये किया जानेवाला प्रसिद्ध आचमन प्राणकी नग्नताके निवारणके लिये नहीं हो सकता' उसके विषयमें हमें यह कहना है कि इस प्रकार हम आचमनको दोनों प्रयोजनोंके लिये नहीं बतलाते । तो फिर क्या कहते हैं ?—हमारा कथन तो यह है कि शुद्धिके लिये किये जानेवाले आचमनका साधनभूत जल प्राणका वस्त्र है--ऐसी दृष्टिका विधान किया गया है । उसमें आचमनके दो प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये होनेरूप दोषकी शङ्का करना उचित नहीं है । यदि कहो कि 'ऐसी दृष्टि करना तो तब उचित होता जब कि आचमन प्राणके वस्त्रके लिये ही किया जाता'—तो |
- यदि कोई मनुष्य कहे कि आधी गाय तो जवान है और आधी बूढ़ी है तो इसे अर्धजरतीय न्याय कहते हैं । अतः ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिये कि अन्नोंमें तो केवल दृष्टिमात्रका विधान है; किंतु आचमन नवीन विहित है !
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३
| न; वासोऽज्ञानाथंवाक्ये वासोऽर्थापूर्वाचमनविधाने तत्रानग्नतार्थत्वदृष्टिविधाने च वाक्यभेदः । आचमनस्य तदर्थत्वमन्यार्थत्वं चेति प्रमाणाभावात्॥२॥ | यह ठीक नहीं; क्योंकि वस्त्रदृष्टिके लिये प्रवृत्त हुए वाक्यमें वस्त्रके लिये नवीन आचमनका विधान और उसमें प्राणकी नग्नताके निवारणरूप प्रयोजनकी दृष्टिका विधान माननेसे वाक्यभेदरूप दोष होगा, क्योंकि आचमनके वासोऽर्थत्व और किसी अन्यार्थत्वमें कोई प्रमाण नहीं है॥२॥ |
प्राणविद्याकी स्तुति
| तदेतत्प्राणदर्शनं स्तूयते। कथम् ? | उस इस प्राणदर्शनकी स्तुति की जाती है; किस प्रकार ? |
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तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥
उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जाबालने वैयाघ्रपद्य गोश्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे शुष्क स्थाणुके प्रति कहे तो उसमें शाखा उत्पन्न हो जायगी और पत्ते फूट आवेंगे ॥ ३ ॥
| तद्वैतत्प्राणदर्शनं सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये नाम्ना वैयाघ्रपद्याय व्याघ्रपदोऽपत्यं वैयाघ्रपद्यस्तस्मै गोश्रुत्याख्यायोक्त्वोवाचान्यदपि वक्ष्यमाणं वचः । किं तदुवाच ? त्याह-- यद्यपि शुष्काय स्थाणव एतद्- | उस इस प्राणदर्शनको सत्यकाम जाबालने गोश्रुतिनामक वैयाघ्रपद्यसे—व्याघ्रपदके पुत्रको वैयाघ्रपद्य कहते हैं, उस गोश्रुति नामवालेसे कहकर और भी आगे कहा जानेवाला वचन कहा। उसने क्या कहा ? सो बतलाते हैं—यदि प्राणवेत्ता पुरुष इस दर्शनको शुष्क स्थाणुके प्रति |
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