छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| वाचमथाशेषं विज्ञास्यस्यशान भुङ्क्ष्व तावत् ॥ ३ ॥ | न हो सकेगा । अब पहले तू भोजन कर तब मेरा वचन सुनकर तू सब जान जायगा ॥ ३ ॥ |
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स हाशाथ हैनमुपससाद तꣳह यत्किं च पप्रच्छ सर्वꣳह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥
उसने भोजन किया और फिर उसके (आरुणिके) पास आया । तब उसने जो कुछ पूछा वह सब उसे उपस्थित हो गया ॥ ४ ॥
| स ह तथैवाश भुक्तवान् ।<br><br>अथानन्तरं हैनं पितरं शुश्रूषुरुपससाद । तं होपगतं पुत्रं यत्किंचर्गादिषु पप्रच्छ ग्रन्थरूपमर्थजातं वा पिता, स श्वेतकेतुः सर्वं ह तत्प्रतिपेद ऋगाद्यर्थतो ग्रन्थतश्च ॥ ४ ॥ | उसने उसी प्रकार (पिताके कथनानुसार) भोजन किया ।<br><br>उसके पश्चात् वह सुननेकी इच्छासे उस अपने पिताके समीप आया । उसने पास आये हुए उस पुत्रसे पिताने ऋगादिमें जो कुछ ग्रन्थरूप अथवा अर्थसमूह पूछा वह सब ऋगादि श्वेतकेतुने ग्रन्थतः तथा अर्थतः जान लिया ॥ ४ ॥ |
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तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥ ५ ॥
उससे [आरुणिने] कहा—हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे बढ़े हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्न कर प्रज्वलित कर दिया जाय तो वह उसकी (अपने पूर्व परिमाणकी) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है' ॥ ५ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६३७
| तं होवाच पुनः पिता यथा । सोम्य महतोऽभ्याहितस्येत्यादि समानम्, एकमङ्गारं शान्तस्याग्नेः खद्योतमात्रं परिशिष्टं तृणैश्चूर्णैश्चोपसमाधाय प्राज्वलयेद्वर्धयेत् । तेनेद्धेनाङ्गारेण ततोऽपि पूर्वपरिमाणाद्बहु दहेत् ॥ ५ ॥ | फिर उससे पिताने कहा—'हे सोम्य ! जिस प्रकार—'महतोऽभ्याहितस्य' इत्यादि पदोंका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये—शान्त हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अंगारा रह जाय और उसे तृण तथा [लकड़ियोंके ] चूरेसे सम्पन्न करके प्रज्वलित किया जाय अर्थात् बढ़ाया जाय तो वह उस दीप्त हुए अंगारेसे उस अपने पूर्व परिमाणकी अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है' ॥ ५ ॥ |
<div align="center">— : ० : —</div>एवꣳ सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता प्राज्वाली तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥
'इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी । वह अन्नद्वारा, वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी । अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है । अतः हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [ श्वेतकेतु ] उसके इस कथनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥ ६ ॥
| एवं सोम्य ते षोडशानामन्नकलानां सामर्थ्यरूपाणामेका | इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सामर्थ्यरूपा अन्नकी सोलह |