छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढ़कर भी कुछ है?' [ सनत्कुमार—] 'आकाशसे बढ़कर भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥
| फलं शृण्वाकाशवतो वै विस्तारयुक्तान् स विद्वाँल्लोकान् प्रकाशवतः प्रकाशाकाशयोर्नित्यसम्बन्धात्प्रकाशवतश्च लोकान् सम्बाधान् सम्बाधनं सम्बाधः सम्बाधोऽन्योऽन्यपीडा तद्रहितानसम्बाधानुरुगायवतो विस्तीर्णगतीन्विस्तीर्णप्रचाराँल्लोकानभिसिध्यति। यावदाकाशस्येत्याद्युक्तार्थम् ॥ २ ॥ | [ इसका ] फल सुनो—वह विद्वान् आकाशवान् यानी विस्तारयुक्त लोकोंको तथा 'प्रकाशवान्'—क्योंकि प्रकाश और आकाशका नित्य सम्बन्ध है अतः प्रकाशयुक्त लोकोंको, 'असम्बाध'—सम्बाधनका नाम सम्बाध और सम्बाध परस्परकी पीड़ाको कहते हैं, उससे रहित असम्बाध और 'उरुगायवान्'—विस्तीर्ण गतिवाले अर्थात् विस्तृत प्रचारवाले लोकोंको प्राप्त होता है। 'यावदाकाशस्य' आदि वाक्यका अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥२॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥
त्रयोदश खण्ड
आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व
स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढ़कर है। इसीसे यद्यपि बहुत-से लोग [एक स्थानपर] बैठे हों तो भी स्मरण न करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं उसी समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको। तुम स्मरकी उपासना करो ॥ १ ॥
| स्मरो वावाकाशाद्भूयः । स्मरणं स्मरोऽन्तःकरणधर्मः । स आकाशाद्भूयानिति द्रष्टव्यं लिङ्गव्यत्ययेन । स्मर्तुः स्मरणे हि सत्याकाशादि सर्वमर्थवत्, स्मरणवतो | स्मर ही आकाशसे बढ़कर है। स्मरणका नाम 'स्मर' है, यह अन्तःकरणका धर्म है। वह आकाशकी अपेक्षा 'भूयान्' (बढ़कर) है—ऐसा लिङ्गपरिवर्तन करके* समझना चाहिये। स्मरण करनेवालेकी स्मृति होनेपर ही आकाशादि सब सार्थक |
※ मूल श्रुति में 'भूयः' यह नपुंसकलिंग है। किंतु 'स्मर' शब्द पुल्लिंग है, अतः उसका विशेषण होनेके कारण 'भूयः' के स्थानमें 'भूयान्' ऐसा पुँल्लिङ्ग पाठ कर लेना चाहिये।