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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| बहिर्ज्वलत एवं शब्दमन्तःशरीर उपशृणोति । <br><br> यदेतज्ज्योतिर्दृष्टश्रुतलिङ्गत्वाद् दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत । यथोपासनाच्चक्षुष्यो दर्शनीयः श्रुतो विश्रुतश्च । यत्स्पर्शगुणोपासननिमित्तं फलं तद्रूपे संपादयति चक्षुष्य इति, रूपस्पर्शयोः सहभावित्वात्, इष्टत्वाच्च दर्शनीयतायाः । एवं च विद्यायाः फलमुपपन्नं स्यान्न तु मृदुत्वादिस्पर्शवत्त्वे । य एवं यथोक्तौ गुणौ वेद । स्वर्गलोकप्रतिपत्तिस्तूक्तमदृष्टं फलम् । द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ८ ॥ | जलते हुए अग्निका शब्द होता है उस प्रकारके शब्दका अपने शरीरके भीतर श्रवण करता है। <br><br> इस प्रकार यह ज्योति दृष्ट और श्रुत लिङ्गयुक्त होनेसे दृष्ट और श्रुत है—इस तरह इसकी उपासना करे। इस प्रकार उपासना करनेसे वह उपासक चक्षुष्य—दर्शनीय और श्रुत—विख्यात हो जाता है। स्पर्शगुणसम्बन्धिनी उपासनासे जो फल होता है उसीको श्रुति 'चक्षुष्य' ऐसा कहकर रूपमें सम्पादन करती है, क्योंकि रूप और स्पर्श ये दोनों साथ-साथ रहनेवाले हैं और दर्शनीयता सबको इष्ट भी है। इस प्रकार [ दर्शनीयताके मिलनेसे ] ही इस विद्याका दृष्ट फल उत्पन्न हो सकता है, मृदुत्वादि स्पर्शयुक्त होनेसे नहीं। इस प्रकार जो इन दोनों गुणोंको जानता है [ उसे इस फलकी प्राप्ति होती है ]। स्वर्गलोककी प्राप्ति तो इसका अदृष्ट फल बतलाया गया है। 'य एवं वेद—य एवं वेद' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है॥८॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

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चतुर्दश खण्ड

शाण्डिल्यविद्या

सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना

पुनस्तस्यैव त्रिपादमृतस्य ब्रह्मणोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तेरनेकभेदोपास्यस्य विशिष्टगुणशक्तिमत्त्वेनोपासनं विधित्सन्नाह—अब फिर उसी त्रिपादमृत, अनन्तगुणवान्, अनन्तशक्ति और अनेक प्रकारसे उपासनीय ब्रह्मकी विशिष्टगुणयुक्त और शक्तिमान् रूपसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥

यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है—इस प्रकार शान्त [रागद्वेषरहित] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है । अतः उस पुरुषको निश्चय करना चाहिये ॥१॥

सर्वं समस्तं खल्विति वाक्यालङ्कारार्थो निपातः । इदं जगन्नामरूपविकृतं प्रत्यक्षादिविषयं ब्रह्म कारणं वृद्धतमत्वादूब्रह्म ।सर्व—समस्त 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है । यह अर्थात् नाम-रूपमय विकारको प्राप्त होनेवाला और प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषयभूत जगत् ब्रह्म—कारणरूप ही है । वृद्धतम [ सबसे बड़ा ] होनेके कारण वह [ जगत्-का कारण ] ब्रह्म कहलाता है ।