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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| भावमेवाभिधत्ते । अतः पुरुषस्य विपरीतग्रहणनिवृत्त्यर्थपरमिदमसदेवेत्यादि वाक्यं प्रयुज्यते । दर्शयित्वा हि विपरीतग्रहणं ततो निवर्तयितुं शक्यत इत्यर्थवत्त्वादसदादिवाक्यस्य श्रौतत्वं प्रामाण्यं च सिद्धमित्यदोषः । तस्मादसतस्सर्वाभावरूपात्सद्विद्यमानं जायत समुत्पन्नम् । अडभावश्छान्दसः ॥ १ ॥ | सत्‌के अभावका ही निरूपण नहीं करता अतः पुरुषके विपरीत ग्रहणकी निवृत्तिके लिये ही 'यह असत् ही था' इत्यादि वाक्यका प्रयोग किया गया है। विपरीतग्रहणको दिखलाकर ही उससे निवृत्त करना सम्भव है। इस प्रकार असत् आदि वाक्य सार्थक होनेके कारण उसका श्रौतत्व और प्रामाण्य सिद्ध ही है। अतः इसमें कोई दोष नहीं है। उस सर्वाभावरूप असत्‌से सत् अर्थात् विद्यमान कार्यजात उत्पन्न हुआ। [मूलमें 'सज्जायत' के स्थानमें 'सत् अजायत' ऐसा होना चाहिये था, सो 'जायत' इस क्रियापदमें ] अट्‌का अभाव वैदिक है ॥ १ ॥ |


| तदेतद्विपरीतग्रहणं महावैनाशिकपक्षं दर्शयित्वा प्रतिषेधति— | इस प्रकार यह विपरीतग्रहणरूप महावैनाशिकका पक्ष दिखलाकर अब [ आरुणि ] उसका प्रतिषेध करता है- |

कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥

"किंतु हे सोम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत्‌से सत्‌की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था' ऐसा [ आरुणिने ] कहा ॥ २ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८९


| [वैनाशिकमत-खण्डनम्]<br>कुतस्तु प्रमाणात्खलु हे सोम्यैवं स्यात्, असतः सज्जायेतेत्येवं कुतो भवेत् ? न कुतश्चित्प्रमाणादेवं संभवतीत्यर्थः । यदपि बीजोपमर्देऽङ्कुरो जायमानो दृष्टोऽभावादेवेति, तदप्यभ्युपगमविरुद्धं तेषाम् । कथम् ? ये तावद्बीजावयवा बीजसंस्थानविशिष्टास्तेऽङ्कुरेऽप्यनुवर्तन्त एव, न तेषामुपमर्दोऽङ्कुरजन्मनि । यत्पुनर्बीजाकारसंस्थानम्, तद्बीजावयवव्यतिरेकेण वस्तुभूतं न वैनाशिकैरभ्युपगम्यते, यदङ्कुरजन्मन्युपमृद्येत । अथ तदस्त्यवयवव्यतिरिक्तं वस्तुभूतम्, तथा च सत्यभ्युपगमविरोधः । | किंतु हे सोम्य ! ऐसा किस प्रमाणसे हो सकता है ? अर्थात् असत्से सत् उत्पन्न हो—ऐसा कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि ऐसा होना किसी भी प्रमाणसे सम्भव नहीं है तथा वे लोग जो यह मानते हैं कि बीजका नाश होनेपर अभावहीसे अङ्कुर उत्पन्न होता देखा गया है वह भी उनके ही सिद्धान्तके विरुद्ध है । किस प्रकार विरुद्ध है ? बीजके आकारसे युक्त जो बीजके अवयव हैं उनकी अनुवृत्ति अङ्कुरमें भी होती ही है; अङ्कुरके उत्पन्न होनेपर उनका नाश नहीं हो जाता । तथा जो बीजाकारका संस्थान है उसे तो वैनाशिक भी बीजके अवयवोंसे भिन्न कोई वस्तु नहीं मानते; जिसका कि अङ्कुरकी उत्पत्ति होनेपर नाश हो । यदि कहो कि बीजावयवोंसे व्यतिरिक्त वह वास्तविक स्वरूपसे है तो यह उनकी ही मान्यताके विरुद्ध होगा। |
| अथ संवृत्याभ्युपगतं बीजसंस्थानरूपमुपमृद्यत इति चेत् ? | यदि कहो कि संवृति (लौकिक व्यवहार) द्वारा माना गया बीजसंस्थानका रूप नष्ट होता है तो यह बतलाओ कि यह संवृति क्या |