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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८९६ छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

८९६ छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ४ ॥

[अतः] वे समिद्पाणि होकर फिर [प्रजापतिके पास] आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अंधा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध रहता है, और यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम रहता है; इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं होता ॥३॥ न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी स्रामतासे वह स्राम होता है; किंतु उसे मानो कोई मारते हों, कोई ताडित करते हों और [उसके कारण] मानो वह अप्रियवेत्ता हो और रुदन करता हो—[ऐसा अनुभव होनेके कारण] इसमें मैं कोई फल नहीं देखता।' तब प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व) की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया; तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ ४ ॥

| नाप्यस्य वधेन स हन्यते छायात्मवन्न चास्य स्राम्येण स्रामः स्वप्नात्मा भवति । यदध्यायादावागममात्रेणोपन्यस्तं नास्य जरयैतज्जीर्यतीत्यादि, | न तो छायात्माके समान इस देहके नाशसे उस (स्वप्नशरीर) का नाश ही होता है और न इसकी स्रामतासे वह स्राम होता है । इस अध्यायके आरम्भमें जो केवल शास्त्रप्रमाणसे कहा गया है कि 'इसकी जरावस्थासे वह जीर्ण नहीं होता' |

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तदिह न्यायेनोपपादयितुमुपन्यस्तम् ।इत्यादि, उसीका न्यायतः उपपादन करनेके लिये यहाँ उल्लेख किया गया है।
न तावदयं छायात्मवद्देहदोषयुक्तः, किन्तु घ्नन्ति त्वेवैनम्। एवशब्द इवार्थे। घ्नन्तीवैनं केचनेति द्रष्टव्यम्, न तु घ्नन्त्येवेति, उत्तरेषु सर्वेष्विवशब्ददर्शनात्।[ इस प्रकार ] यह छायात्माके समान देहके दोषोंसे तो युक्त नहीं है; किंतु इसे मानो कोई मारते हैं। [ 'घ्नन्ति त्वेव' इस पदमें ] 'एव' शब्द 'इव' अर्थमें है; अतः इसका 'मानो इसे कोई मारते हैं' यही भाव समझना चाहिये, 'मारते ही हैं' ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि उत्तरवर्ती सब वाक्योंमें 'इव' शब्द ही देखा जाता है।
नास्य वधेन हन्यत इति विशेषणाद्घ्नन्ति त्वेवेति चेत् ? नैवम्, प्रजापतिं प्रमाणीकुर्वतोऽनृतवादित्वापादनानुपपत्तेः । 'एतदमृतम्' इत्येतत्प्रजापतिवचनं कथं मृषा कुर्यादिन्द्रस्तं प्रमाणीकुर्वन् ।यदि कहो कि 'यह इस ( स्थूल शरीर ) का नाश होनेसे नष्ट नहीं होता' ऐसा विशेषण होनेके कारण 'इसे कोई मारते ही हैं' यहो अर्थ समझना चाहिये तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाले व्यक्तिके लिये उनपर मिथ्यावादित्वका आरोप करना सम्भव नहीं है। भला, प्रजापतिको प्रामाणिक माननेवाला इन्द्र उनके 'यह अमृत है' इस वचनको मिथ्या कैसे कर सकता है।