छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति । एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥
लोक इस (मुख्य प्राण) के द्वारा न सुगन्धको जानता है और न दुर्गन्धको ही जानता है; क्योंकि यह पापसे पराभूत नहीं है। अतः यह जो कुछ खाता या पीता है उससे अन्य प्राणोंका (इन्द्रियोंका) पोषण करता है। अन्तमें इस मुख्य प्राणको प्राप्त न होनेके कारण ही [घ्राणादि प्राणसमूह] उत्क्रमण करता है और इसीसे अन्तमें पुरुष मुख फाड़ देता है ॥ ९ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| नैवैतेन सुरभि दुर्गन्धि वा विजानाति घ्राणेनैव तदुभयं विजानाति लोकः। अतश्च पाप्मकार्यादर्शनादपहतपाप्माप-हतो विनाशितोऽपनीतः पाप्मा यस्मात्सोऽयमपहतपाप्मा ह्येष विशुद्ध इत्यर्थः। | लोक इस मुख्य प्राणके द्वारा न सुगन्धको जानता है और न दुर्गन्ध-को ही, इन दोनोंको वह घ्राणके द्वारा ही जानता है। अतः पापका कार्य न देखे जानेके कारण यह अपहतपाप्मा है—जिससे पाप अपहत-विनाशित अर्थात् दूर कर दिया गया है वह यह मुख्य प्राण अपहतपाप्मा अर्थात् विशुद्ध है। |
| यस्माच्चात्मंभरयः कल्याणा-द्यासङ्गवत्त्वाद्व्राणादयो न तथात्मंभरिर्मुख्यः, किं तर्हि ? सर्वार्थः कथम् ? इत्युच्यते—तेन मुख्येन यदश्नाति यत्पिबति | क्योंकि घ्राणादि इन्द्रियाँ अपने-अपने कल्याणमें आसक्त होनेके कारण अपना ही पोषण करनेवाली हैं और मुख्य प्राण उस प्रकार अपना ही पोषण करनेवाला नहीं है; तो फिर वह कैसा है ? वह तो सभीका हितकारी है। किस प्रकार ? सो बतलाया जाता है—उस मुख्य |
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९ |
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| लोकस्तेनाशितेन पीतेन चेतरान् घ्राणादीनवति पालयति। तेन हि तेषां स्थितिर्भवतीत्यर्थः। अतः सर्वंभरिः प्राणोऽतो विशुद्धः।<br><br>कथं पुनर्मुख्याशितपीताभ्यां स्थितिरेषां गम्यते ? इत्युच्यते-<br>एतं मुख्यं प्राणम्, मुख्यप्राणस्य वृत्तिमन्नपाने इत्यर्थः, अन्ततोऽन्ते मरणकालेऽवित्त्वालब्ध्वोत्क्रामति घ्राणादिप्राणसमुदाय इत्यर्थः। अप्राणो हि न शक्नोत्यशितुं पातुं वा। तेन तदोत्क्रान्तिः प्रसिद्धा घ्राणादिकलापस्य।<br><br>दृश्यते ह्युत्क्रान्तौ प्राणस्याशिशिषा। अतो व्याददात्येवास्यविदारणं करोतीत्यर्थः। तद्ध्यन्नालाभ उत्क्रान्तस्य लिङ्गम् ॥९॥ | प्राणके द्वारा लोग जो कुछ खाते-पीते हैं उस खाये-पीयेसे वह मुख्य प्राण घ्राणादि दूसरे प्राणोंका पोषण करता है, क्योंकि उसीसे उन सब-की स्थिति होती है। इसलिये मुख्य प्राण सभीका पोषण करनेवाला है, अतः वह विशुद्ध है।<br><br>किंतु मुख्य प्राणाद्वारा खाये-पीये पदार्थोंसे अन्य प्राणोंकी स्थिति किस प्रकार जानी जाती है ? सो बतलाते हैं—इस मुख्य प्राणको अर्थात् इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप अन्न-पानको न पाकर ही अन्त समय—मरण-कालमें घ्राणादि इन्द्रिय-समुदाय उत्क्रमण करता है, क्योंकि प्राणहीन पुरुष खाने या पीनेमें समर्थ नहीं होता। इसीसे उस समय घ्राणादि इन्द्रिय-समुदायकी उत्क्रान्ति प्रसिद्ध है। उत्क्रमणके समय प्राणकी भोजन करनेकी इच्छा स्पष्ट देखी जाती है। इसीसे उस समय वह मुख बा देता है। यही उत्क्रमण करनेवाले घ्राणादिको अन्नादि प्राप्त न होनेका चिह्न है ॥ ९ ॥ |
<div align="center">प्राणकी आङ्गिरस संज्ञा होनेमें हेतु
तꣳ हाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥ १० ॥
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