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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३

२९६छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ३

उपर्युक्त प्राणादि द्वारपालोंकी उपासनाका फल

ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वार-
पाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वार-
पान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य
एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद॥६॥

वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। वह जो कोई भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है उसके कुलमें वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

ते वा एते यथोक्ताः पञ्चसुषिसंबन्धात्पञ्च ब्रह्मणो हार्दस्य पुरुषा राजपुरुषा इव द्वारस्थाः स्वर्गस्य हार्दस्य लोकस्य द्वारपा द्वारपालाः। एतैर्हि चक्षुःश्रोत्रवाङ्मनः प्राणैर्बहिर्मुखप्रवृत्तैर्ब्रह्मणो हार्दस्य प्राप्तिद्वाराणि निरुद्धानि। प्रत्यक्षं ह्येतदजितकरणतया बाह्यविषयासङ्गानृतप्ररूढत्वान्न हार्दे ब्रह्मणि मनस्तिष्ठति। तस्मात्सत्यमुक्तमेते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपा इति।वे ही ये, जैसे कि ऊपर बतलाये गये हैं, पाँच सुषियोंके सम्बन्धके कारण हृदयस्थ ब्रह्मके पाँच पुरुष हैं, अर्थात् द्वारस्थ राजपुरुषोंके समान हृदयस्थ स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। चक्षु, श्रोत्र, वाक्, मन और प्राणोंके द्वारा बाहरकी ओर प्रवृत्त हुए इन्हींके द्वारा हृदयस्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके द्वार रुके हुए हैं। यह बात प्रत्यक्ष ही है कि अजितेन्द्रियताके कारण बाह्य विषयोंकी आसक्तिरूप अनृतसे व्याप्त रहनेके कारण मन हृदयस्थित ब्रह्ममें स्थित नहीं होता। अतः यह ठीक ही कहा है कि ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं।

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अतः स य एतानेवं यथोक्तगुणविशिष्टान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद उपास्त उपासनया वशीकरोति स राजद्वारपालानिवोपासनेन वशीकृत्य तैरनिवारितः प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं राजानमिव हार्दं ब्रह्म ।अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोंको इस प्रकार जानता है—उपासना करता है अर्थात् उपासनाद्वारा अपने अधीन करता है, वह राजाके द्वारपालोंके समान इन्हें उपासनाद्वारा वशीभूत कर इनसे निवारित न होता हुआ राजाको प्राप्त होनेके समान स्वर्गलोक यानी हृदयस्थित ब्रह्मको प्राप्त होता है।
किं चास्य विदुषः कुले वीरः पुत्रो जायते वीरपुरुषसेवनात् । तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासनप्रवृत्तिहेतुत्वम् । ततश्च स्वर्गलोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भवतीति स्वर्गलोकप्रतिपत्तिरेवैकं फलम् ॥ ६ ॥तथा वीर पुरुषका सेवन करनेके कारण इस विद्वान्के कुलमें वीर पुत्र उत्पन्न होता है । वह पुत्र पितृऋणकी निवृत्ति करके उसे ब्रह्मकी उपासनामें प्रवृत्त करनेका हेतु होता है । अतः वह परम्परासे उसकी स्वर्गलोकप्राप्तिका भी कारण होता है; इसलिये स्वर्गलोककी प्राप्ति ही इसका एकमात्र फल है ॥ ६ ॥
अथ यदसौ विद्वान्स्वर्गं लोकं वीरपुरुषसेवनात्प्रतिपद्यते, यच्चोक्तं "त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति तदिदं लिङ्गेन चक्षुःश्रोत्रेन्द्रिय-तथा वह विद्वान् वीर पुरुषका सेवन करनेसे जिस स्वर्गलोकको प्राप्त होता है और जिस स्वर्गका "इसका तीन पादरूप अमृत द्युलोकमें है" इस प्रकार वर्णन किया गया है उसीको अब अनुमापक लिङ्गद्वारा चक्षु और श्रोत्रेन्द्रियका विषय