सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| तस्मात् "तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति" इति सगुणब्रह्मोपासकस्य प्राणैः सह नाड्या गमनम्, सापेक्षमेव चामृतत्वम्, न साक्षान्मोक्ष इति गम्यते; "तदपराजिता पूस्तदैरं मदीयं सरः" इत्याद्युक्त्वा "तेषामेवैष ब्रह्मलोकः" इति विशेषणात् । | अतः "उस मूर्धन्य नाडीसे ऊपरकी ओर जाता हुआ वह अमरत्वको प्राप्त होता है" इस प्रकार सगुण ब्रह्मोपासकका प्राणोंके साथ मूर्धन्य नाडीसे जाना सापेक्ष अमृतत्व ही है, साक्षात् मोक्ष नहीं है—यह जाना जाता है; क्योंकि श्रुतिने "वह अपराजिता पुरी है, वह हर्षोत्पादक सरोवर है" ऐसा कहकर "उन [ सगुण ब्रह्मोपासकों ] को ही यह ब्रह्मलोक मिलता है"—ऐसा विशेषण दिया है । |
| अतः पञ्चाग्निविदो गृहस्था ये चेमेऽरण्ये वानप्रस्थाः परिव्राजकाश्च सह नैष्ठिकब्रह्मचारिभिः श्रद्धा तप इत्येवमाद्युपासते श्रद्दधानास्तपस्विनश्चेत्यर्थः । उपासनशब्दस्तात्पर्यार्थः, "इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते" इति यद्वत् । श्रुत्यन्तराच्च सत्यं ब्रह्म हिरण्यगर्भाख्यमुपासते ते सर्वेऽर्चिषमर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्ते । समा- | अतः पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ और जो ये वनवासी—नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंके सहित वानप्रस्थ और संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इत्यादिकी उपासना करते हैं अर्थात् श्रद्धालु एवं तपस्वी हैं । जैसा कि 'इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते" इस श्रुतिमें है उसीके समान यहाँ 'उपासन' शब्द तत्परताके अर्थमें है । तथा एक अन्य श्रुतिके अनुसार जो हिरण्यगर्भसंज्ञक सत्यब्रह्मकी उपासना करते हैं वे सब अर्चि यानी अर्चिके अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं । शेष सब चतुर्थ अध्यायके अन्तर्गत [ उपकोसल विद्यामें (छा० ४।१५।५ |

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थं ५०९
ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ

नमन्यच्चतुर्थगतिव्याख्यानेन । एष देवयानः पन्था व्याख्यातः सत्यलोकावसानः, नाण्डाद्बहिः, “यदन्तरा पितरं मातरं च” (बृ० उ० ६।२।२) इति मन्त्रवर्णात् ॥ १-२ ॥में ) बतलायी हुई ] गतिकी व्याख्याके समान है । यह सत्यलोकमें समाप्त होनेवाले देवयानमार्गकी व्याख्या की गयी; इस मार्गकी ब्रह्माण्डसे बाहर गति नहीं है; जैसा कि जो “पिता ( द्युलोक ) और माता ( पृथिवी ) के बीचमें है” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है ॥ १-२ ॥

—:०:—

तृतीय प्रश्नका उत्तर
( देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान )

अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिश्रात्रेपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड् दक्षिणैति मासाँस्तान्नैते संवत्सरमभिप्रामुवन्ति ॥३॥

तथा जो ये गृहस्थलोग ग्राममें इष्ट, पूर्त और दत्त—ऐसी उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं; धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणमार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते हैं । ये लोग संवत्सरको प्राप्त नहीं होते ॥ ३ ॥

अथेत्यर्थान्तरप्रस्तावनाथः, य इमे गृहस्था ग्रामे, ग्राम इति गृहस्थानामसाधारणं विशेषणमरण्यवासिभ्यो व्यावृत्त्यर्थम् , यथा; वानप्रस्थपरिव्राजकानामरण्यं विशेषणं गृहस्थेभ्यो व्या-‘अथ’ यह शब्द दूसरे विषयकी प्रस्तावनाके लिये है, जो ये गृहस्थगण ग्राममें—जिस प्रकार ‘अरण्यम्’ यह वानप्रस्थ और परिव्राजकोंका गृहस्थोंसे व्यावृत्ति करनेके लिये असाधारण विशेषण था, उसी प्रकार ‘ग्रामे’ यह वनवासियोंसे व्यावृत्ति करनेके लिये गृहस्थोंका