छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| मनोवृत्तिमात्रं तथान्यान्यप्युपासनानि मनोवृत्तिरूपाणीत्यस्ति हि सामान्यम्। कस्तर्ह्यद्वैतज्ञानस्योपासनानां च विशेषः? उच्यते— | प्रकार अद्वैतज्ञान मनोवृत्तिमात्र है उसी प्रकार अन्य उपासनाएँ भी मनोवृत्तिरूप ही हैं--यही उन दोनोंकी समानता है। तो फिर अद्वैतज्ञान और उपासनाओंमें अन्तर क्या है? सो बतलाया जाता है— |
| ज्ञानोपासनयोर्विशेषः<br>स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रियेऽध्यारोपितस्य कर्त्रादिकारकक्रियाफलभेदविज्ञानस्य निवर्तकमद्वैतविज्ञानम्, रज्ज्वादाविव सर्पाद्यध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्वादिस्वरूपनिश्चयः प्रकाशनिमित्तः। उपासनं तु यथाशास्त्रसमर्थितं किञ्चिदालम्बनमुपादाय तस्मिन् समानचित्तवृत्तिसंतानकरणं तद्विलक्षणप्रत्ययानन्तरितमिति विशेषः। | अद्वैतात्मज्ञान अक्रिय आत्मामें स्वभावसे ही आरोपित कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है, जिस प्रकार कि प्रकाशके कारण होनेवाला रज्जु आदिके स्वरूपका निश्चय रज्जु आदिमें आरोपित सर्पादिके ज्ञानको निवृत्त कर देता है। किंतु उपासना तो किसी शास्त्रोक्त आलम्बनको ग्रहण कर उसमें विजातीय प्रतीतिसे अव्यवहित सदृश चित्तवृत्तिका प्रवाह करना है—यही इन दोनोंमें अन्तर है। |
| तान्येतान्युपासनानि सत्त्वशुद्धिकरत्वेन वस्तुतत्त्वावभासकत्वादद्वैतज्ञानोपकारकाण्यालम्बनविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति पूर्वमुपन्यस्यन्ते। तत्र कर्माङ्गा- | वे ये उपासनाएँ चित्तशुद्धि करनेवाली होनेसे वस्तुतत्त्वकी प्रकाशिका होनेके कारण अद्वैतज्ञानमें उपकारिणी हैं तथा आलम्बनयुक्त होनेके कारण सुगमतासे सम्पन्न की जा सकती हैं—इसीलिये इनका पहले निरूपण किया जाता है। वहाँ [ साधारण पुरुषोंमें ] |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
| सस्य दृढीभूतत्वात्कर्मपरित्यागेनोपासन एव दुःखं चेतःसमर्पणं कर्तुमिति कर्माङ्गविषयमेव तावदादावुपासनमुपन्यस्यते— | कर्माभ्यासकी दृढ़ता होनेके कारण कर्मका परित्याग करके उपासनामें ही चित्तको लगाना अत्यन्त कठिन है। इसीसे सबसे पहले कर्माङ्ग-सम्बन्धिनी उपासनाका ही उल्लेख किया जाता है— |
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उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥
ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये । 'ॐ' ऐसा [उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) करता है । उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥
| ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमित्येतदक्षरं परमात्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम् । तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति प्रियनामग्रहण इव लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्तमभिधायकत्वाद्व्यावर्तितं शब्दस्वरूपमात्रं प्रतीयते । तथा चार्चादिवत्परस्यात्मनः | उद्गीथशब्दवाच्य 'ॐ' इस अक्षरकी उपासना करे—'ॐ' यह अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती ( प्रियतम ) नाम है । उसका प्रयोग (उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न होता है, जिस प्रकार कि साधारण लोग अपना प्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होते हैं । वह ओंकार यहाँ ( इस मन्त्रमें ) इतिपरक ( जिसके आगे 'इति' शब्द है; ऐसा ) प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् परमात्माका अभिधायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा व्यावर्तित ( पृथक् निर्दिष्ट ) होकर वह केवल शब्दस्वरूपसे प्रतीत होता है और इस प्रकार वह मूर्ति |
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