छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथेदानीं कृत्यादिषूत्तरोत्तरेषु सत्सु सत्यं स्वयमेव प्रतिभासत इति न तद्विज्ञानाय पृथग्यत्नः कार्य इति प्राप्तं तत इदमूच्यते—सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमित्यादि । सुखं भगवो विजिज्ञास इत्यभिमुखीभूतायाह ॥ १ ॥ | अब यह प्राप्त होता है कि—कृतिसे लेकर उत्तरोत्तर साधनोंके होनेपर सत्य स्वयं ही अनुभव हो जायगा, उसके विज्ञानके लिये पृथक् प्रयत्न नहीं करना चाहिये—इसीसे यह कहा गया है कि 'सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये' इत्यादि । फिर 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' इस प्रकार [ सुखविज्ञानके प्रति ] अभिमुख हुए नारदजीसे सनत्कुमारजी कहते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥
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त्रयोविंश खण्ड
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भूमा ही जानने योग्य है
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] ‘निश्चय जो भूमा है वही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।’ [नारद—] ‘भगवन्! मैं भूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥
| यो वै भूमा महन्निरतिशयं बह्विति पर्यायास्तत्सुखम् । ततोऽर्वाक्सातिशयत्वादल्पम् । अतस्तस्मिन्नल्पे सुखं नास्ति । अल्पस्याधिकतृष्णाहेतुत्वात् । तृष्णा च दुःखबीजम् । न हि दुःखबीजं सुखं दृष्टं ज्वरादि लोके । तस्माद्युक्तं नाल्पे सुखमस्तीति । अतो भूमैव सुखम् । तृष्णादिदुःखबीजत्वासम्भवाद्भुम्नः ॥ १ ॥ | निश्चय जो भूमा है—महान्, निरतिशय और बहु—ये इसके पर्याय हैं—वही सुख है। उससे नीचेके पदार्थ सातिशय (न्यूनाधिक) होनेके कारण अल्प हैं। अतः उस अल्पमें सुख नहीं है; क्योंकि अल्प तो अधिक तृष्णाका हेतु है और तृष्णा दुःखका बीज है। तथा लोकमें दुःखके बीजभूत ज्वरादि सुखरूप नहीं देखे गये। अतः ‘अल्पमें सुख नहीं है’ यह कथन ठीक ही है। इसलिये भूमा ही सुखरूप है; क्योंकि भूमामें दुःखके बीजभूत तृष्णादिका होना असम्भव है ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥
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चतुर्विंश खण्ड
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भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन
| किंलक्षणोऽसौ भूमेत्याह— | यह भूमा किन लक्षणोंवाला है, सो बतलाते हैं— |
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यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता वह भूमा है। किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य है।'
[नारद—] 'भगवन् ! वह (भूमा) किसमें प्रतिष्ठित है?'
[सनत्कुमार—] 'अपनी महिमामें, अथवा अपनी महिमामें भी नहीं है' ॥ १ ॥
| यत्र यस्मिन्भूम्नि तत्त्वे नान्यद्द्रष्टव्यमन्येन करणेन द्रष्टान्यो विभक्तो दृश्यात्पश्यति तथा नान्यच्छृणोति। नामरूपयोरेवान्तर्भावाद्विषयभेदस्य, तद्ग्राहक- | जहाँ—जिस भूमातत्त्वमें दृश्यसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा किसी अन्य द्रष्टव्य विषयको अन्य इन्द्रियके द्वारा नहीं देखता और न कुछ सुनता ही है। विषयभेदका अन्तर्भाव नाम और रूपमें ही हो जाता है; अतः उनका ग्रहण |
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| खण्ड २४] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| योरेवेह दर्शनश्रवणयोर्ग्रहणम्, अन्येषां चोपलक्षणार्थत्वेन। मननं त्वत्रोक्तं द्रष्टव्यं नान्यन्मनुत इति, प्रायशो मननपूर्वकत्वाद्विज्ञानस्य। तथा नान्यद्विजानाति; एवंलक्षणो यः भूमा। | करनेवाली दर्शन और श्रवण इन दो इन्द्रियोंका ही यहाँ अन्य इन्द्रियोंके उपलक्षणार्थ ग्रहण किया गया है। किंतु मननका यहाँ 'नान्यन्मनुते' ऐसा कहकर अलग उल्लेख किया गया है—ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि विज्ञान प्रायः मननपूर्वक हुआ करता है; तथा जहाँ कुछ और जानता भी नहीं—जो ऐसे लक्षणोंवाला है वह भूमा है। |
| किमत्र प्रसिद्धान्यदर्शनाभावो भूम्युच्यते नान्यत्पश्यतीत्यादिना ? अथान्यन्न पश्यत्यात्मानं पश्यतीत्येतत् ? | गुरु—यहाँ [यह विचारना है कि] 'नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे भूमामें लोकप्रसिद्ध अन्य दर्शनका अभाव बतलाया गया है अथवा अन्यको नहीं देखता, इसलिये अपनेको ही देखता है—यह बतलाया गया है ? |
| किं चातः ? | शिष्य—इससे क्या [हानि-लाभ] है ! |
| यद्यन्यदर्शनाद्यभावमात्रमित्युच्यते तदा द्वैतसंव्यवहारविलक्षणो भूमेत्युक्तं भवति। अथान्यदर्शनविशेषप्रतिषेधेनात्मानं पश्यतीत्युच्यते तदैकस्मिन्नेव | गुरु—यदि इस वाक्यद्वारा अन्य पदार्थके दर्शनादिका अभाव ही बतलाया गया हो तब तो यह बात कही जाती है कि भूमा द्वैतव्यवहारसे विलक्षण है और यदि अन्यदर्शनविशेषका प्रतिषेध करके यह कहा गया हो कि वह अपनेको देखता है तो एकमें |