छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे ।
तँ हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥
उन्होंने नासिकामें रहनेवाले प्राणके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। किन्तु असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे वह सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनोंको सूँघता है, क्योंकि वह पापसे बिंधा हुआ है ॥२॥
| ते ह देवा नासिक्यं नासिकायां भवं प्राणं चेतनावन्तं घ्राणं प्राणमुद्गीथकर्तारमुद्गातारमुद्गीथभक्त्योपासांचक्रिरे कृतवन्त इत्यर्थः। नासिक्यप्राणदृष्ट्योद्गीथाख्यमक्षरमोङ्कारमुपासांचक्रिर इत्यर्थः। एवं हि प्रकृतार्थपरित्यागोऽप्रकृतार्थोपादानं च न कृतं स्यात्। 'खल्वेतस्यैवाक्षरस्य' इत्योङ्कारो ह्युपास्यतया प्रकृतः। <br><br> ननूद्गीथोपलक्षितं कर्माहृतवन्त इत्यवोचः, इदानीमेव कथं नासिक्यप्राणदृष्ट्योङ्कारमुपासांचक्रिर इत्यात्थ ? | प्रसिद्ध है, उन देवताओंने नासिक्य—नासिकामें रहने वाले प्राण यानी चेतनावान् घ्राणेन्द्रियकी, जो उद्गीथकर्ता—उद्गाता है, उद्गीथ-भक्तिसे उपासना की, तात्पर्य यह है कि उद्गीथसंज्ञक ओंकार अक्षरकी नासिकामें रहनेवाले प्राणके रूपमें उपासना की। इस प्रकार प्रकृत अर्थ-का परित्याग और अप्रकृत अर्थका ग्रहण नहीं करना पड़ता; क्योंकि 'खल्वेतस्यैवाक्षरस्य' इस श्रुतिवचन-के अनुसार यहाँ उपास्यरूपसे ओंकारका ही प्रकरण है। <br><br> शंका—किंतु तुमने तो कहा था कि उन्होंने 'उद्गीथ' शब्दसे उप-लक्षित कर्मका अनुष्ठान किया। अब ऐसा क्यों कहते हो कि उद्गीथ-संज्ञक ओंकार अक्षरकी ही नासिकामें स्थित प्राणके रूपमें उपासना की ? |
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५१ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| नैष दोषः; उद्गीथकर्मण्येव हि तत्कर्तृप्राणदेवतादृष्ट्योद्गीथभक्त्यवयवश्चोङ्कार उपास्यत्वेन विवक्षितो न स्वतन्त्रः। अतस्तादर्थ्येन कर्माहृतवन्त इति युक्तमेवोक्तम्। | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि यहाँ उद्गीथ कर्ममें ही उसका कर्ता जो प्राणदेवता है उसीकी दृष्टिसे उद्गीथभक्तिका अवयवभूत ओंकार उपास्यरूपसे विवक्षित है—स्वतन्त्र ओंकार नहीं। अतः उसीके लिये उद्गाताके कर्मका अनुष्ठान किया—ऐसा जो कहा है वह उचित ही है। |
| तमेवं देवैर्वृतमुद्गातारं हासुराः स्वाभाविकतम आत्मानो ज्योतीरूपं नासिक्यं प्राणं देवं स्वोत्थेन पाप्मना धर्मासङ्गरूपेण विविधुर्विद्धवन्तः संसर्गं कृतवन्त इत्यर्थः। स हि नासिक्यः प्राणः कल्याणगन्धग्रहणाभिमानासङ्गाभिभूतविवेकविज्ञानो बभूव। स तेन दोषेण पाप्मसंसर्गी बभूव। तदिदमुक्तमसुराः पाप्मना विविधुरिति। | देवताओंसे इस प्रकार वरण किये हुए उस उद्गाता ज्योतिःस्वरूप नासिकास्थित प्राणदेवको स्वभावसे ही तमोमय असुरोंने अधर्म और आसक्तिरूप अपने पापसे बेध दिया; अर्थात् उससे संयुक्त कर दिया। वह जो नासिकास्थित प्राण है उसमें पुण्य गन्धको ग्रहण करनेके अभिमान और आसक्तिरूप दोष आ जानेसे उसके विवेक और विज्ञानका अभाव हो गया। उस दोषके कारण वह पापसे संसर्ग रखनेवाला हो गया। इसीसे यह कहा है कि असुरोंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। |
| यस्मादासुरेण पाप्मना विद्धस्तस्मात्तेन पाप्मना प्रेरितो घ्राणः प्राणो दुर्गन्धग्राहकः प्राणिनाम्। अतस्तेनोभयं जिघ्रति लोकः | क्योंकि प्राण आसुर पापसे विद्ध है इसलिये उस पापसे प्रेरित हुआ ही वह प्राणियोंका घ्राणसंज्ञक प्राण दुर्गन्धको ग्रहण करनेवाला है। इसीसे लोक सुगन्धि और दुर्गन्धि |