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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
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२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| स्यात्तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे बन्धदाहाभावः संसारदुःखनि- वृत्तिर्मोक्षश्चेति । | अद्वैत आत्मारूप परम सत्यमें प्रतीति रखनेवाले पुरुषको, जो पुरुष चोर नहीं है उसके तप्त परशु ग्रहण करनेपर दाह और बन्धन न होनेके समान, संसार-दुःखकी निवृत्ति और मोक्षकी प्राप्ति बतलावेगी । |
|---|---|
| कर्मसमुच्चय-निराकरणम् <br> अत एव न कर्मसहभावि- अद्वैतात्मदर्शनम् । क्रियाकारकफलभे- दोपमर्देन "सन्...एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इत्येवमादिवाक्य- जनितस्य बाधकप्रत्ययानुप- पत्तेः । कर्मविधिप्रत्यय इति चेत् ? न, कर्तृभोक्तृस्वभाव- विज्ञानवतस्तज्जनितकर्मफलरा- गद्वेषादिदोषवतश्च कर्मविधा- नात् । | इसीसे [अर्थात् कर्म और ज्ञान दोनों विरुद्ध फलवाले हैं-ऐसा निश्चय होनेके कारण ही] अद्वैतात्म-दर्शन कर्मके साथ होनेवाला नहीं है । क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेदका बाध करके "सत् [ब्रह्म] एक और अद्वितीय है" "यह सब आत्मा ही है" इत्यादि प्रकारके वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले अद्वैत आत्मज्ञानका कोई बाधक प्रत्यय होना सम्भव नहीं है । यदि कहो कि कर्मविधिविषयक ज्ञान ही [उसका बाधक] है तो ऐसा होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि जो अपनेको स्वभावसे ही कर्त्ता-भोक्त्तारूप जानता है और उससे होनेवाले कर्मफलमें रागद्वेषरूप दोषोंसे युक्त है, उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है । |
| अधिगतसकलवेदार्थस्य कर्म- विधानादद्वैतज्ञानवतोऽपि कर्मे- ति चेत् ? | शङ्का—जो सम्पूर्ण वेदार्थको जानने-वाला है उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है; इसलिये अद्वैतात्मज्ञानी-को भी तो कर्म करना ही चाहिये ? |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न; कर्माधिकृतविषयस्य कर्तृभोक्त्रादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य “सत्...एकमेवाद्वितीयम्” 'आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यनेनोपमर्दितत्वात् । तस्मादविद्यादिदोषवत एव कर्माणि विधीयन्ते नाद्वैतज्ञानवतः । अत एव हि वक्ष्यति—“सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छा० उ० २।२३।१) इति ।<br><br>(प्रकरणप्रतिपाद्यनिरूपणम्)<br>तत्रैतस्मिन्नद्वैतविद्याप्रकरणेऽभ्युदयसाधनान्युपासनान्युच्यन्ते । कैवल्यसंनिकृष्टफलानि चाद्वैतादीषद्विकृतब्रह्मविषयाणि मनोमयःप्राणशरीर इत्यादीनि, कर्मसमृद्धिफलानि च कर्माङ्गसम्बन्धीनि । रहस्यसामान्यान्मनोवृत्तिसामान्याच्च; यथाऽद्वैतज्ञानं | **समाधान—**नहीं, क्योंकि कर्मके अधिकारीसे सम्बन्ध रखनेवाला कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि रूप स्वाभाविक विज्ञान “सत [ ब्रह्म ] एक और अद्वितीय है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि वाक्योंसे बाधित हो जाता है । इसलिये कर्मोंका विधान अविद्यादि दोषवान् पुरुषके लिये ही किया गया है, अद्वैतात्मज्ञानीके लिये नहीं किया गया । इसीलिये श्रुति आगे कहेगी—“ये सब [कर्मकाण्डी] पुण्यलोकोंको प्राप्त होते हैं तथा ब्रह्मनिष्ठ [परमहंस] अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।”<br><br>वहाँ इस अद्वैतविद्याविषयक प्रकरणमें अभ्युदयकी साधनभूता उपासनाएँ बतलायी जाती हैं, जिनका फल कैवल्यमोक्षका समीपवर्ती है और जो अद्वैतब्रह्मकी अपेक्षा 'मनोमयः प्राणशरीरः' इत्यादि वाक्योंके अनुसार कुछ विकारको प्राप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं । वे उपासनाएँ कर्माङ्गसे सम्बद्ध हैं और कर्मफलकी समृद्धि ही उनका फल है । क्योंकि रहस्यमें [ अर्थात् उपनिषद् शब्दसे ज्ञातव्य होनेमें ] तथा मनोवृत्तिरूप होनेमें उन (आत्मज्ञान और उपासनाओं) में समानता है [इसीसे वे उपासनाएँ आत्मविद्याके प्रकरणमें रक्खी गयी हैं] । जिस |