छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| ३७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| देव एकोऽग्न्यादीन्वायुर्वागादीन् प्राणः, कः स प्रजापतिर्जगार ग्रसितवान् कः स जगारेति प्रश्नमेके । भुवनस्य भवन्त्यस्मिन् भूतानीति भुवनं भूरादिः सर्वो लोकस्तस्य गोपा गोपायिता रक्षिता गोप्तेत्यर्थः । तं कं प्रजापतिं हे कापेय नाभि- पश्यन्ति न जानन्ति मर्त्या मरणधर्माणोऽविवेकिनो वा हेऽभिप्रतारिन्बहुधाध्यात्ममाधिदैवताधिभूतप्रकारैर्वसन्तम् । यस्मै वा एतदहन्यहन्यन्नमदनायाह्रियते संस्क्रियते च तस्मै प्रजापतय एतदन्नं न दत्तमिति ॥ ६ ॥ | क—प्रजापतिने अर्थात् वायुने अग्नि आदिको और प्राणने वागादिको ग्रस लिया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि जिसने ग्रसा है वह एक देव कौन है ? इस प्रकार यह प्रश्न है । वह भुवनका—जिसमें भूत ( प्राणी ) आदि होते हैं उस भूर्लोक आदि समस्त लोकोंको भुवन कहते हैं, उसका गोपा—गोपायिता अर्थात् रक्षा करनेवाला है । हे कापेय ! उस क अर्थात् प्रजापतिको अथवा हे अभिप्रतारिन् ! अनेक प्रकारसे यानी अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-भेदसे वास करते हुए उस देवको मर्त्य—मरणधर्मा अथवा अविवेकी पुरुष नहीं देखते । तथा जिसके भक्षणके लिये नित्यप्रति इस अन्नका आहरण-संस्कार किया जाता है उस प्रजापतिको ही यह अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥ |
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तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाँ१हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥७॥
उस वाक्यका कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ने मनन किया और फिर उस [ ब्रह्मचारी ] के पास आकर कहा—'जो देवताओंका आत्मा, प्रजाओंका
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७५
उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरोंसे न खाया जानेवाला और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता है, हे ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं । [ ऐसा कहकर उसने सेवकोंको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा दो' ॥ ७ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| तदु ह—ब्रह्मचारिणो वचनं शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानो मनसालोचयन्ब्रह्मचारिणं प्रत्ये-यायाजगाम । गत्वा चाह यं त्वमवोचो न पश्यन्ति मर्त्या इति तं वयं पश्यामः; कथम् ? आत्मा सर्वस्य स्थावरजङ्गमस्य, किञ्च देवानामग्न्यादीनामात्मनि संहृत्य ग्रसित्वा पुनजनितोत्पाद-यिता वायुरूपेणाधिदैवतमग्न्या-दीनाम् । अध्यात्मं च प्राण-रूपेण वागादीनां प्रजानां च जनिता । | कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ब्रह्मचारी-के उस वचनकी मनसे आलोचना कर ब्रह्मचारीके समीप गया तथा जाकर इस प्रकार बोला—जिसके विषयमें तुमने कहा कि मर्त्यगण उसे नहीं देखते उसे हम देखते हैं । किस प्रकार देखते हैं ? वह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमका आत्मा तथा अग्नि आदि देवताओंका उत्पत्तिकर्ता अर्थात् अधिदैवत वायुरूपसे अपनेमें लीन कर अग्नि आदिका पुनः उत्पन्न करनेवाला और अध्यात्म प्राणरूपसे वागादि प्रजाओंकी उत्पत्ति करने-वाला है । |
| अथवात्मा देवानामग्निवागा-दीनां जनिता प्रजानां स्थावर-जङ्गमानाम् । हिरण्यदंष्ट्रोऽमृतदंष्ट्रो-ऽभग्नदंष्ट्र इति यावत् । बभसो भक्षणशीलः । अनसूरिः सूरिर्मे- | अथवा यों समझो कि अग्नि और वाक् आदि देवोंका आत्मा और स्थावर-जङ्गम प्रजाओंका उत्पत्तिकर्ता है । हिरण्यदंष्ट्र—अमृतदंष्ट्र अर्थात् जिसकी डाढ़ें कभी नहीं टूटतीं, 'बभसः'—भक्षणशील, 'अनसूरिः'—सूरि मेधावीको कहते हैं, जो सूरि न |