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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

६७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६७२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्तथा योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेतस एष वृक्ष इदानीं जीवेनात्मनानुप्रभूतोऽनुव्याप्तः पेपीयमानोऽत्यर्थं पिबन्नुदकं भौमांश्च रसान्मूलैर्गृह्णन्मोदमानो हर्षं प्राप्नुवंस्तिष्ठति ॥ १ ॥ | जीवित रहते हुए ही रसस्राव कर देता है और यदि अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करता है। इस समय यह वृक्ष जीव-आत्मासे अनुप्रभूत—पूर्णतः व्याप्त है और अत्यन्त जलपान करता हुआ तथा अपनी जड़द्वारा पृथिवीके रसोंको ग्रहण करता हुआ—मोदमान होता—हर्ष पाता हुआ स्थित है ॥ १ ॥ |


अस्य यदेकाँ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति ॥ २ ॥

यदि इस वृक्षकी एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूख जाती है; यदि दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है ॥ २ ॥

| तस्यास्य यदेकां शाखां रोगग्रस्तामाहतां वा जीवो जहात्युपसंहरति शाखायां विप्रसृतमात्मांशम्, अथ सा शुष्यति। वाङ्मनःप्राणकरणग्रामानुप्रविष्टो | उस इस वृक्षकी यदि एक रोगग्रस्त अथवा आहत शाखाको जीव छोड़ देता है—उस शाखामें व्याप्त जीवांश उपसंहृत हो जाता है तो वह सूख जाती है; क्योंकि वाणी, मन, प्राण तथा इन्द्रियग्राममें जीव अनुप्रविष्ट है इसलिये |

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३

शाङ्करभाष्यभाुष्यार्थ
हि जीव इति तदुपसंहार उपसंह्रियते । जीवेन च प्राणयुक्तेनाशितं पीतं च रसतां गतं जीववच्छरीरं वृक्षं च वर्धयद्रसरूपेण जीवस्य सद्भावे लिङ्गं भवति । अशितपीताभ्यां हि देहे जीवस्तिष्ठति ते चाशितपीते जीवकर्मानुसारिणी इति । तस्यैकाङ्गवैकल्यनिमित्तं कर्म यदोपस्थितं भवति तदा जीव एकां शाखां जहाति शाखाया आत्मानमुपसंहरति । अथ तदा सा शाखा शुष्यति ।उनका उपसंहार होनेपर वह भी उपसंहृत हो जाता है । प्राणयुक्त जीवके द्वारा भी भक्षण तथा पान किया हुआ अन्न-जल रसभावको प्राप्त होता है; वह रसरूपसे जीवयुक्त शरीर तथा सजीव वृक्षकी वृद्धि करता हुआ जीवके सद्भावमें लिङ्ग है । खाये-पीये हुए अन्न-जलसे ही जीव देहमें रहता है । वे खानपान जीवके कर्मानुसार होते हैं । जिस समय उसके एक अङ्गकी विकलताका निमित्तभूत कर्म उपस्थित होता है उस समय जीव एक शाखाको छोड़ देता है—उस एक शाखासे अपना उपसंहार कर लेता है । इसके पश्चात् तब वह शाखा सूख जाती है ।
जीवस्थितिनिमित्तो रसो जीवकर्माक्षिप्तो जीवोपसंहारे न तिष्ठति । रसापगमे च शाखा शोषमुपैति तथा सर्वं वृक्षमेव यदायं जहाति तदा सर्वोऽपि वृक्षः शुष्यति । वृक्षस्य रसस्रवणशोषणादिलिङ्गाज्जीववत्त्वं दृष्ट्वा-जीवके कर्मानुसार प्राप्त हुआ तथा जीवकी स्थितिके कारण रहनेवाला रस जीवका उपसंहार होनेपर नहीं रहता; और रसके निकल जानेपर शाखा सूख जाती है । इसी प्रकार जब यह सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा ही वृक्ष सूख जाता है । वृक्षके रसस्राव एवं शोषण आदि लिङ्गसे उसकी सजीवता सिद्ध होती है तथा [ 'स एष वृक्षः जीवेन आत्मना अनु-