छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| क्रियाकारकफलभेदोऽभ्युपगतो भवेत् । <br> यद्येवं को दोषः स्यात् ? <br><br> नन्वयमेव दोषः संसारावि-वृत्तिः । क्रियाकारकफलभेदो हि संसार इति । आत्मैकत्व एव क्रियाकारकफलभेदः संसारवि-लक्षण इति चेत् ? न; आत्मनो निर्विशेषैकत्वाभ्युपगमे दर्शना-दिक्रियाकारकफलभेदाभ्युपगमस्य शब्दमात्रत्वात् । <br><br> अन्यदर्शनाद्यभावोक्तिपक्षेऽपि यत्रेत्यन्यन्न पश्यतीति च विशे-षणे अनर्थके स्यातामिति चेत् ? दृश्यते हि लोके यत्र शून्ये गृहेऽन्यन्न पश्यतीत्युक्ते स्तम्भा-दीनात्मानं च न पश्यतीति न गम्यते। एवमिहापीति चेत् ? | ही क्रिया, कारक और फलरूप भेद मानना हो जाता है। <br> **शिष्य—**यदि ऐसा ही हो तो उसमें दोष क्या होगा ? <br><br> **गुरु—**उसके संसारकी निवृत्ति न होना—बस यही दोष है, क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेद ही संसार है। यदि कहो कि आत्माका एकत्व होनेपर भी उसमें जो क्रिया, कारक और फलरूप भेद है वह संसारसे विलक्षण है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्माका निर्विशेष एकत्व स्वीकार करनेपर जो उसमें दर्शनादि क्रिया, कारक और फलरूप भेद स्वीकार करना है वह तो शब्दमात्र है। <br><br> **शिष्य—**किंतु अन्य दर्शनादि-का अभाव प्रतिपादन करनेके पक्षमें भी 'यत्र' और 'अन्यन्न पश्यति' ये दो विशेषण निरर्थक होंगे। लोकमें यह देखा ही जाता है कि जहाँ सूने घरमें 'किसी औरको नहीं देखता' ऐसा कहा जाता है वहाँ यह नहीं समझा जाता कि उस घरके स्तम्भादि और अपनेको भी नहीं देखता। यदि ऐसा ही यहाँ भी हो तो ? |
| खण्ड २४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८९ |
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| न; तत्त्वमसीत्येकत्वोपदेशादधिकरणाधिकर्तव्यभेदानुपपत्तेः। तथा सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति षष्ठे निर्धारितत्वात्। "अदृश्येऽनात्म्ये" (तै० उ० २।७।१) "न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य" (क० उ० ६।९) "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" (बृ० उ० २।४।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः स्वात्मनि दर्शनाद्यनुपपत्तिः। | गुरु— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि 'तू वह है' इस प्रकार एकत्वका उपदेश होनेके कारण आधार-आधेयरूप भेदका होना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार छठे अध्यायमें भी यह निश्चय किया जा चुका है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है'। तथा "देखनेमें न आने-वाले शरीररहित····आत्मामें" "इसका रूप दृष्टिमें नहीं आता" "अरे ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने" इत्यादि श्रुतियोंसे भी स्वात्मामें दर्शनादिका होना सम्भव नहीं है। |
| यत्रेति विशेषणमनर्थकं प्राप्तमिति चेत् ? | शिष्य— किंतु इस प्रकार 'यत्र' यह विशेषण व्यर्थ सिद्ध होता है ? |
| न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्। यथा सत्यैकत्वाद्वितीयत्वबुद्धिं प्रकृतामपेक्ष्य सदेकमेवाद्वितीयमिति संख्याद्यनर्हमप्युच्यते, एवं भूम्न्येकस्मिन्नेव यत्रेति विशेषणम्। अविद्यावस्थायामन्यदर्शनानुवादेन च भूम्नस्तदभावत्वलक्षणस्य विवक्षितत्वान्नान्यत्पश्यतीति विशेषणम्। तस्मात्संसारव्यवहारो भूम्नि नास्तीति समुदायार्थः। | गुरु— नहीं, क्योंकि यह अविद्याकृत भेदकी अपेक्षासे है। जिस प्रकार प्रासङ्गिक सत्य एकत्व और अद्वितीयत्वबुद्धिकी अपेक्षासे—संख्या आदिके योग्य न होनेपर भी—'सत् एक और अद्वितीय है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार एक ही भूमामें 'यत्र' यह विशेषण है। तथा अविद्यावस्थामें अन्य दर्शनका अनुवाद होनेके कारण भूमाको उसके अभावत्वरूप लक्षण-वाला बतलाना इष्ट होनेसे 'नान्यत्पश्यति' ऐसा विशेषण दिया गया है। अतः सारांश यह है कि भूमामें संसारव्यवहार नहीं है। |