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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स्थानीयादृग्वेदविहितात्कर्मण अप आदाय ऋग्भिर्मधु निर्वर्त्यते।स्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मसे ही रस ग्रहण करके ऋचाओंद्वारा मधु तैयार किया जाता है।
कास्ता आपः ? इत्याह—ताः कर्मणि प्रयुक्ताः सोमाज्यपयोरूपा अग्नौ प्रक्षिप्तास्तत्पाकाभिनिर्वृत्ता अमृता अमृतार्थत्वादत्यन्तरसवत्य आपो भवन्ति। तद्रसानादाय ता वा एता ऋचः पुष्पेभ्यो रसमाददाना इव भ्रमरा ऋचः एतमृग्वेद-मृग्वेदविहितं कर्म पुष्पस्थानीयम् अभ्यतपन्नभितापं कृतवत्य इवैता ऋचः कर्मणि प्रयुक्ताः।वे रस क्या हैं ? सो श्रुति बतलाती है—वे कर्मोंमें प्रयुक्त अर्थात् अग्निमें डाले हुए सोम, घृत एवं दुग्धरूप रस अग्निपाकसे निष्पन्न हुए अमृत होते हैं अर्थात् अमृतत्व ( मोक्ष ) के हेतु होनेके कारण वे [ अमृतसंज्ञक ] जल अत्यन्त रसमय होते हैं। उन रसोंको ही ग्रहण करके इन ऋचाओंने—पुष्पोंसे रस ग्रहण करनेवाले भ्रमरोंके समान इन ऋचाओंने इस ऋग्वेदको—पुष्पस्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मको अभितप्त किया अर्थात् कर्ममें प्रयुक्त हुई इन ऋचाओंने मानो उनका अभिताप किया।
ऋग्भिर्हि मन्त्रैः शस्त्राद्यङ्गभावमुपगतैः क्रियमाणं कर्म मधुनिर्वर्तकं रसं मुञ्चतीत्युपपद्यते पुष्पाणीव भ्रमरैराचूष्यमाणानि। तदेतदाह—तस्यग्वेदस्याभितप्तस्य, कोऽसौ रसः? यशस्त्रादि यज्ञाङ्गभावको प्राप्त हुए ऋगादि मन्त्रोंद्वारा ही किया हुआ कर्म भ्रमरोंसे चूसे जाते हुए पुष्पोंके समान मधु बनानेवाला रस छोड़ता है—यह कथन ठीक ही है। इसी बातको यह श्रुति बतलाती है—उस अभितप्त ऋग्वेदका वह कौन-सा रस

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७


| ऋङ्मधुकराभितापनिःसृत इत्युच्यते ।<br><br>यशो विश्रुतत्वं तेजो देहगता दीप्तिरिन्द्रियं सामर्थ्योपेतैरिन्द्रियैरवैकल्यं वीर्यं सामर्थ्यं बलमित्यर्थः, अन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं च येनोपयुज्यमानेनाहन्यहनि देवानां स्थितिः स्यात्तदन्नाद्यमेष रसोऽजायत यागादिलक्षणात् कर्मणः ॥ २-३ ॥ | है ? जो ऋग्रूप मधुकरके अभितापसे निकला हुआ है—ऐसा कहा जाता है ।<br><br>उस यागादिरूप कर्मसे यश—विख्याति, तेज—देहगत दीप्ति, इन्द्रिय—सामर्थ्ययुक्त इन्द्रियोंके कारण—अविकलता, वीर्य—सामर्थ्य यानी बल और अन्नाद्य—जो अन्न हो और खाद्य (भक्ष्य) भी हो, जिसका प्रतिदिन उपयोग किये जानेपर देवताओंकी स्थिति हो उसे अन्नाद्य कहते हैं—ऐसा रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥ |

—: ० :—

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितꣳरूपम् ॥ ४ ॥

वह (यश आदि रस) विशेषरूपसे गया। उसने [जाकर] आदित्यके [पूर्व] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका रोहित (लाल) रूप है वही यह (रस) है ॥ ४ ॥

| यशआद्यन्नाद्यपर्यन्तं तद्व्यक्षरद्विशेषेणाक्षरद्गमत् । गत्वा च तदादित्यमभितः पार्श्वतः पूर्वभागं सवितुरश्रयदाश्रितवदित्यर्थः । अमुष्मिन्नादित्ये संचितं | यशसे लेकर अन्नाद्यपर्यन्त वह रस ‘व्यक्षरत्’ विशेषरूपसे गया। उसने जाकर सूर्यको पार्श्वतः सूर्यके पूर्वभागको आश्रित किया, ऐसा इसका तात्पर्य है । हम इस आदित्यमें संचित हुए कर्मफलसंज्ञक |