छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
११० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
११० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
'सामकी गति ( आश्रय ) क्या है ?' इसपर दूसरेने 'स्वर' ऐसा कहा। 'स्वरकी गति क्या है ?' ऐसा प्रश्न होनेपर दूसरेने 'प्राण' ऐसा कहा। 'प्राणकी गति क्या है ?' इसपर दूसरेने 'अन्न' ऐसा कहा। तथा 'अन्नकी गति क्या है ?' ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्यने 'बल' ऐसा कहा ॥४॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| का साम्नः प्रकृतत्वादुद्गीथस्य। उद्गीथो ह्यत्रोपास्यत्वेन प्रकृतः। “परोवरीयांसमुद्गीथम्” ( १।९।२ ) इति च वक्ष्यति। गतिराश्रयः परायणमित्येतत्। एवं पृष्टो दाल्भ्य उवाच—स्वर इति; स्वरात्मकत्वात्साम्नः। यो यदात्मकः स तद्गतिस्तदाश्रयश्च भवतीति युक्तं मृदाश्रय इव घटादिः। | सामकी—प्रकरणप्राप्त होनेके कारण उद्गीथकी गति—आश्रय अर्थात् परायण क्या है ? क्योंकि यहाँ उपास्यरूपसे उद्गीथका ही प्रकरण है, जैसा कि ‘परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते’ ( १।९।२ ) इत्यादि श्रुतिमें कहेंगे भी। इस प्रकार पूछे जानेपर दाल्भ्यने कहा—‘स्वर’ क्योंकि साम स्वरस्वरूप है। जिस प्रकार [मृत्तिकामय] घटादि पदार्थोंका मृत्तिका ही आश्रय होती है, उसी प्रकार जो पदार्थ यदात्मक—जिसके स्वरूपसे युक्त होता है उस पदार्थकी वही गति और आश्रय भी होता है—यह उचित ही है। |
| स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच। प्राणनिष्पाद्यो हि स्वरस्तस्मात्स्वरस्य प्राणो गतिः। प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाच। अन्नावष्टम्भो हि प्राणः। “शुष्यति वै प्राण | ‘स्वरकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर [दाल्भ्यने] ‘प्राण’ ऐसा कहा, क्योंकि स्वर प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है, इसलिये स्वरकी गति प्राण है। ‘प्राणकी गति क्या है ?’ ऐसा पूछे जानेपर उसने कहा ‘अन्न’, क्योंकि प्राण अन्नके ही आश्रय रहनेवाला है, जैसा कि |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यथ १११
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| ऋतेऽन्नात्” ( बृ० उ० ५ । १२ । १ ) इति हि श्रुतेः। “अन्नं दाम” ( बृ० उ० २ । २ । १ ) इति च। अन्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच। अप्संभवत्वादन्नस्य ॥ ४ ॥ | “अन्नके बिना प्राण सूख जाता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा “अन्न यह [वत्सस्थानीय प्राणकी] रस्सी है” ऐसी श्रुति भी है। फिर ‘अन्नकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर दाल्भ्यने कहा—‘आप्’ क्योंकि अन्न आप् ( जल ) से ही उत्पन्न होनेवाला है ॥ ४ ॥ |
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अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोक२सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गस२-स्ताव२हि सामेति ॥ ५ ॥
‘जलकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर उसने ‘वह लोक’ ऐसा कहा। ‘उस लोककी गति क्या है ?’ इसपर दाल्भ्यने कहा कि ‘स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके सामको कोई किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जा सकता। हम सामको स्वर्गलोकमें ही स्थित करते हैं, क्योंकि सामकी स्वर्गरूपसे स्तुति की गयी है’ ॥ ५ ॥
| अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाच। अमुष्मान्लोकाद् वृष्टिः संभवति। अमुष्य लोकस्य का गतिः ? इति पृष्टो दाल्भ्य उवाच। स्वर्गममुं लोकमतीत्याश्रयान्तरं साम न नयेत्कश्चिदिति होवाच। | ‘जलोंकी गति क्या है ?’ इसपर दाल्भ्यने ‘वह लोक’ ऐसा कहा, क्योंकि उस लोकसे ही वृष्टि होनी सम्भव है। ‘उस लोककी क्या गति है ?’ ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्यने कहा—‘उस स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके कोई सामको किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जा सकता।’ |