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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
२२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
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| २२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्मसंस्थता। वाचारम्भणमात्रविकारानृताभिसंधिप्रत्ययवत्त्वात्। न चासत्यमित्युपमर्दिते भेदप्रत्यये सत्यमिदमनेन कर्तव्यं मयेति प्रमाणप्रमेयबुद्धिरुपपद्यते। आकाश इव तलमलबुद्धिर्विवेकिनः। | नहीं हो सकती, क्योंकि वह वाचारम्भणमात्र विकारमें मिथ्याभिनिवेशरूप प्रतीति करनेवाला होता है। यह असत्य है—इस प्रकार भेदप्रतीतिके बाधित हो जानेपर उसमें 'यह सत्य है, इससे मुझे यह कर्तव्य है' ऐसी प्रमाण-प्रमेयरूप बुद्धि होनी सम्भव नहीं है, जिस प्रकार कि विवेकी पुरुषको आकाशमें तलमलबुद्धि होनी। |
| उपमर्दितेऽपि भेदप्रत्यये कर्मभ्यो न निवर्तते चेत्प्रागिव भेदप्रत्ययोपमर्दनादेकत्वप्रत्ययविधायकं वाक्यमप्रमाणीकृतं स्यात्। अभक्ष्यभक्षणादिप्रतिषेधवाक्यानां प्रामाण्यवद्युक्तमेकत्ववाक्यस्यापि प्रामाण्यम्; सर्वोपनिषदां तत्परत्वात्। | यदि भेदप्रतीतिके नष्ट हो जानेपर भी बोधवान् पुरुष भेदज्ञानकी निवृत्ति होनेसे पूर्वके समान कर्मोंसे निवृत्त नहीं होता तो वह मानो एकत्वविधायक वाक्योंको अप्रामाणिक सिद्ध करता है। अभक्ष्यभक्षणका प्रतिषेध करनेवाले वाक्योंकी प्रामाणिकताके समान एकत्वप्रतिपादक वाक्यकी प्रामाणिकता भी उचित ही है; क्योंकि सम्पूर्ण उपनिषदें उसीका प्रतिपादन करनेमें तत्पर हैं। |
| (कर्मविधीनामप्रामाण्यनिरसनम्)<br>कर्मविधीनामप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेत् ? | **पूर्व०—**इस प्रकार तो कर्मविधियोंकी अप्रामाणिकताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। |
| न; अनुपमर्दितभेदप्रत्ययवत्पुरुषविषये प्रामाण्योपपत्तेः, स्वप्नादिप्रत्यय इव प्राक्प्रबोधात्। | **सिद्धान्ती—**नहीं, जिस पुरुषका भेदज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है उसके सम्बन्धमें उनकी प्रामाणिकता हो सकती है, जिस प्रकार कि जागनेसे पूर्व स्वप्नादिका ज्ञान प्रामाणिक माना जाता है! |
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| खण्ड २३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २२३ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| विवेकिनामकरणात्कर्मविधि- <br> प्रामाण्योच्छेद इति चेत् ? | पूर्व०— किंतु विवेकियोंके न करनेसे तो कर्मविधिकी प्रमाणताका उच्छेद मानना ही होगा। |
| न, काम्यविध्यनुच्छेददर्शनात् <br> न हि कामात्मता न प्रशस्तेत्येवं <br> विज्ञानवद्भिः काम्यानि कर्माणि <br> नानुष्ठीयन्त इति काम्यकर्मविधय <br> उच्छिद्यन्तेऽनुष्ठीयन्त एव कामि- <br> भिरिति । तथा ब्रह्मसंस्थैर्ब्रह्मवि- <br> द्भिर्नानुष्ठीयन्ते कर्माणीति न <br> तद्विधय उच्छिद्यन्तेऽब्रह्मविद्भिर- <br> नुष्ठीयन्त एवेति । | सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि काम्य-विधिको उच्छेद होता देखा नहीं गया। 'सकामता अच्छी नहीं है' ऐसा जिन्हें ज्ञान हो गया है उन पुरुषोंद्वारा काम्यकर्म नहीं किये जाते, अतः काम्यकर्मोंकी विधियोंका उच्छेद हो गया हो—ऐसी बात देखनेमें नहीं आती; बल्कि [ उस समय भी ] सकाम पुरुषोंद्वारा उनका अनुष्ठान किया ही जाता है। इसी प्रकार यदि ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया जाता तो इससे उनकी विधिका ही उच्छेद नहीं हो जाता। जो ब्रह्मवेत्ता नहीं हैं उनके द्वारा उनका अनुष्ठान किया ही जाता है। |
| परिव्राजकानां भिक्षाचरणा- <br> दिवदुत्पन्नैकत्वप्रत्ययानामपि <br> गृहस्थादीनामग्निहोत्रादिकर्मा- <br> निवृत्तिरिति चेत् ? | पूर्व०— जिस प्रकार संन्यासीलोग भिक्षाटन करते हैं उसी प्रकार जिन्हें एकत्वज्ञान उत्पन्न हो गया है उन गृहस्थोंके भी अग्निहोत्रादि कर्मोंकी निवृत्ति नहीं होनी चाहिये, यदि ऐसी शङ्का हो तो ? |
| न; प्रामाण्यचिन्तायां पुरुष- <br> प्रवृत्तेरदृष्टान्तत्वात् । न हि | सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि प्रमाणता-का विचार करनेमें पुरुषकी प्रवृत्ति दृष्टान्तरूप नहीं हो सकती। |