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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| थङ्नानादिकास्त्वां बलयो वस्त्रा-न्नादिलक्षणा बलय आयन्त्या-गच्छन्ति । पृथग्रथश्रेणयो रथ-पङ्क्तयोऽपि त्वामनुयन्ति ॥ १ ॥ | —नाना दिशाओंसे वस्त्र एवं अन्नादिरूप उपहार आते हैं; तथा पृथक्-पृथक् रथश्रेणियाँ—रथकी पङ्क्तियाँ भी तुम्हारे पीछे चलती हैं'१ |

—: ० :—

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किंतु यह आत्माका प्राण ही है'—ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता' ॥२॥

| अत्स्यन्नमित्यादि समानम् ।<br><br>प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच<br><br>प्राणस्ते तवोदक्रमिष्यदुत्क्रान्तोऽभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | 'अत्स्यन्नम्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । 'किंतु यह आत्माका प्राण ही है' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता अर्थात् उत्क्रान्त हो जाता' ॥ २ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥

पञ्चदश खण्ड

一: ० :一

अश्वपति और जनका संवाद

अथ होवाच जनँशार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमु-
पास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै
बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से
तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥

तदनन्तर राजाने जनसे कहा—'हे शार्कराक्ष्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला- ] 'यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि तुम उपासना करते हो । इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण बहुल हो' ॥ १ ॥

अथ होवाच जनमित्यादि समानम् । एष वै बहुल आत्मा वैश्वानरः । बहुलत्वमाकाशस्य सर्वगतत्वाद्वहुलगुणोपासनाच्च । त्वं बहुलोऽसि प्रजया च पुत्रपौत्रादिलक्षणया धनेन च हिरण्यादिना ॥ १ ॥'फिर उसने जनसे कहा' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । सर्वगत होनेके कारण तथा बहुल-गुणरूपसे उपासित होनेके कारण आकाशका बहुलत्व ( पूर्णत्व ) है । इसीसे तुम पुत्र पौत्रादिरूप प्रजा और सुवर्णादि धनसे बहुल ( परिपूर्ण ) हो ॥ १ ॥

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-