छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| विद्यां प्रति तृड्विच्छेदकरीति पुरुषयज्ञविद्यां स्तौति । | का छेदन करनेवाली हुई' —ऐसा कहकर श्रुति पुरुषयज्ञविद्याकी स्तुति करती है । |
| घोर आङ्गिरसः कृष्णायोक्त्वेमां विद्यां किमुवाच ? इति तदाहस एवं यथोक्तयज्ञविदन्तवेलायां मरणकाल एतन्मन्त्रत्रयं प्रतिपद्येत जपेदित्यर्थः । | घोर आङ्गिरसने कृष्णके प्रति यह विद्या कहकर क्या कहा—यह बतलाते हैं—पूर्वोक्त यज्ञविद्याको जाननेवाला वह पुरुष अन्तिम समय-मरणकाल उपस्थित होनेपर इन तीन मन्त्रोंको प्रतिपन्न हो अर्थात् इनका जप करे । वह मन्त्र कौन-से हैं ? |
| किं तत् ? अक्षितमक्षीणमक्षतं वासीत्येकं यजुः । सामर्थ्यादित्यस्थं प्राणं चैकीकृत्याह— तथा तमेवाहाच्युतं स्वरूपादप्रच्युतमसीति द्वितीयं यजुः । | 'तू अक्षित—अक्षीण अथवा अक्षय है' यह एक यजु है । प्रसङ्गके सामर्थ्यसे यह कथन आदित्यस्थ पुरुष और प्राणकी एकता करके किया गया है। तथा उसीके प्रति श्रुति कहती है—'तू अच्युत—स्वरूपसे च्युत न होनेवाला है—यह दूसरा यजु है । |
| प्राणसंशितं प्राणश्च स संशितं सम्यक्तनूकृतं च सूक्ष्मं तत्त्वमसीति तृतीयं यजुः । तत्रैतस्मिन्नर्थे विद्यास्तुतिपरे द्वे ऋचौ मन्त्रौ भवतः, न जपार्थे, त्रयं प्रतिपद्येतेति त्रित्वसंख्याबाध- | 'तू प्राणसंशित—जो प्राण संशित—सम्यक् प्रकारसे तनु यानी सूक्ष्म किया गया है वह तू है'—यह तीसरा यजु है । इस अर्थमें इस विद्याकी स्तुति करनेवाली दो ऋचाएँ यानी दो मन्त्र हैं, किंतु वे जपके लिये नहीं हैं, क्योंकि पहले जो 'त्रयं प्रतिपद्येत' ( तीनका जप करे ) ऐसी विधि की गयी है उसकी 'तीन संख्याका बाध हो |
खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्य ३३५
| नात्; पञ्चसंख्या हि तदा स्यात् ॥ ६ ॥ | जायगा और तब 'पाँच' संख्या हो जायगी ॥ ६ ॥ |
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आदित्प्रत्नस्य रेतसः । उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरꣳस्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥
[ 'आदित्प्रत्नस्य रेतसः' यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि'* इसका अर्थ यह है—] पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश, जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है। [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें प्रकाशमान सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥ ७ ॥
| आदितित्यत्राकारस्यानुबन्धस्तकारोऽनर्थक इच्छब्दश्च। प्रत्नस्य चिरन्तनस्य पुराणस्येत्यर्थः, रेतसः कारणस्य बीजभूतस्य जगतः सदाख्यस्य ज्योतिः प्रकाशं पश्यन्ति । आशब्द उत्सृष्टानुबन्धः पश्यन्तीत्यनेन संबध्यते । किं तज्ज्योतिः | 'आत् इत्' इसमें आकारके पीछेका तकार और 'इत्' शब्द अर्थरहित हैं। 'प्रत्नस्य'—चिरन्तन यानी पुरातन 'रेतसः' कारणके अर्थात् जगत्के बीजभूत सत्-संज्ञक ब्रह्मके 'ज्योतिः'—प्रकाशको देखते हैं। अपने अनुबन्ध तकारसे रहित 'आ' शब्द 'पश्यन्ति' इस क्रियासे सम्बद्ध है । उस किस ज्योतिको देखते हैं ? इसपर श्रुति |
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* आनन्दगिरिकृत टीकासे ।