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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

९४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

९४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


| धर्माणामपहन्तृ विनाशयित्रीत्ये- | और धर्मका हनन अर्थात् विनाश |
| तत् । यदेवंलक्षणं श्येतं लिन्दु | करनेवाला है। जो ऐसे लक्षणों- |
| | वाला श्येत लिन्दु—पिच्छिल स्त्री- |
| पिच्छलं तन्माभिगां माभिग- | चिह्न है उसे प्राप्त न होऊँ उसमें |
| | गमन न करूँ । 'माभिगाम् |
| च्छेयम् । द्विर्वचनमत्यन्तानर्थ- | माभिगाम्' यह द्विरुक्ति उसका |
| | अत्यन्त अनर्थहेतुत्व प्रदर्शित |
| हेतुत्वप्रदर्शनार्थम् ॥ १ ॥ | करनेके लिये है ॥ १ ॥ |

—: ❀ :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये चतुर्दशखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

पञ्चदश खण्ड

—:०:—

आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और फलका वर्णन

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्य आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्याय-मधीयानो धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्र-तिष्ठाप्याहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरा-वर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १ ॥

उस इस आत्मज्ञानका ब्रह्मा ने प्रजापतिके प्रति वर्णन किया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार गुरुके कर्त्तव्यकर्मोंको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययन कर आचार्यकुलसे समावर्तनकर कुटुम्बमें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ [ पुत्र एवं शिष्यादिको ] धार्मिक कर सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अन्तः-करणमें स्थापित कर शास्त्रकी आज्ञासे अन्यत्र प्राणियोंकी हिंसा न करता हुआ वह निश्चय ही आयुकी समाप्तिपर्यन्त इस प्रकार बर्तता हुआ [ अन्तमें ] ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है; और फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १ ॥

तद्धैतदात्मज्ञानं सोपकरणम्[शमादि] उपकरणोंके सहित उस इस आत्मज्ञानका 'ओमित्येतदक्षरम्'
'ओमित्येतदक्षरम्' इत्याद्यैः सहो-इत्यादि उपासनाओंके सहित उसका