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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

९३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| कस्य शाबल्यम्, तं ब्रह्मलोकं शबलं प्रपद्ये मनसा शरीरपातादूर्ध्वं गच्छेयम् । यस्मादहं शबलाद्ब्रह्मलोकान्नामरूपव्याकरणाय श्यामं प्रपद्ये हार्दंभावं प्रपन्नोऽस्मीत्यभिप्रायः । अतस्तमेव प्रकृतिस्वरूपमात्मानं शबलं प्रपद्य इत्यर्थः । | उसकी शबलता है, उस शबल ब्रह्मलोकको मनसे—शरीरपातके पश्चात् प्राप्त होऊँ—जाऊँ, क्योंकि मैं नाम-रूपकी अभिव्यक्तिके लिये शबल ब्रह्मलोकसे श्याम—हार्द-भावको प्राप्त हुआ हूँ, ऐसा इसका अभिप्राय है । अतः तात्पर्य यह है कि मैं उस अपने प्रकृतिस्वरूप शबल आत्माको प्राप्त होऊँ । |
| कथं शबलं ब्रह्मलोकं प्रपद्ये ? इत्युच्यते—अश्व इव स्वानि लोमानि विधूय कम्पनेन श्रमं पांस्वादि च रोमतोऽपनीय यथा निर्मलो भवत्येवं हार्दब्रह्मज्ञानेन विधूय पापं धर्माधर्माख्यं चन्द्र इव च राहुग्रस्तस्तस्माद्राहोर्मुखात्प्रमुच्य भास्वरा भवति यथा—एव धूत्वा प्रहाय शरीरं सर्वानर्थाश्रयमिहैव ध्यानेन कृतात्मा कृतकृत्यः सन्नकृतं नित्यं ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीति । द्विर्वचनं मन्त्रसमाप्त्यर्थम् ॥ १ ॥ | मैं शबल ब्रह्मलोकको कैसे प्राप्त हो सकता हूँ ? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार अश्व अपने रोएँ हिलाकर अर्थात् रोम-कम्पनके द्वारा श्रम और धूलि आदि दूर करके जैसे निर्मल हो जाता है उसी प्रकार हार्दब्रह्मके ज्ञानसे धर्माधर्म-रूप पापको झाड़कर तथा राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान जिस प्रकार कि वह राहुके मुखसे निकलकर प्रकाशमान हो जाता है उसी प्रकार सम्पूर्ण अनर्थोंके आश्रयभूत शरीरको त्याग-कर इस लोकमें ही ध्यानद्वारा कृतात्मा—कृतकृत्य हो अकृत—नित्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ । 'ब्रह्मलोकमभिसम्भवामि' इसकी द्विरुक्ति मन्त्रकी समाप्तिके लिये है ॥ १ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये त्रयोदश-
खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

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चतुर्दश खण्ड


कारणरूपसे आकाशसंज्ञक ब्रह्मका उपदेश

आकाशो वा इत्यादि ब्रह्मणो लक्षणनिर्देशार्थम् आध्यानाय।'आकाशो वै' इत्यादि श्रुति उत्तम प्रकारसे ध्यान करनेके निमित्त ब्रह्मका लक्षण निर्देश करनेके लिये है।

आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतꣴ स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः इयेतमदत्कमदत्कꣳश्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥ १ ॥

आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है। वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है। मैं प्रजापतिके सभागृहको प्राप्त होता हूँ; मैं यशःसंज्ञक आत्मा हूँ; मैं ब्राह्मणोंके यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यशःस्वरूप आत्मा) को प्राप्त होना चाहता हूँ; वह मैं यशोंका यश हूँ; मैं बिना दाँतोंके भक्षण करनेवाले रोहित वर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥

आकाशो वै नाम श्रुतिषु प्रसिद्ध आत्मा; आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वाच्च । स'आकाश' इस नामसे श्रुतियोंमें आत्मा प्रसिद्ध है, क्योंकि वह आकाशके समान अशरीर और सूक्ष्म है। वह आकाश (आकाश-

छा० उ० ३१–