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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
८६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
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| ८६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| तु विद्याग्रहणसम्प्रदानविधिप्रदर्शिनार्था विद्यास्तुत्यर्था च । राजसेवितं पानीयमितिवत् । | विधि प्रदर्शित करने एवं विद्याकी स्तुतिके लिये है, जिस प्रकार [ जलकी प्रशंसा करनेके लिये ] 'यह जल राजाद्वारा सेवित है' ऐसा कहा जाता है । |
य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥
जो आत्मा [ धर्माधर्मादिरूप ] पापशून्य, जरारहित, मृत्युहीन, विशोक, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है उसे खोजना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है—ऐसा प्रजापतिने कहा ॥ १ ॥
| य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः, यस्योपासनायोपलब्ध्यर्थं हृदयपुण्डरीकमभिहितम्, यस्मिन्कामाः समाहिताः सत्या अनृतापिधानाः, यदुपासनसहभावि ब्रह्मचर्यं | जो आत्मा पापरहित, जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधारहित, तृषाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, जिसकी उपासना अर्थात् उपलब्धिके लिये हृदयपुण्डरीक स्थान बतलाया गया है, जिसमें मिथ्यासे अपिहित (ढँके हुए) सत्यकाम सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं, जिसकी उपासनाके साथ-साथ रहनेवाला |
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| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८१७ |
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| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
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| साधनमुक्तम्, उपासनफलभूतकामप्रतिपत्तये च मूर्धन्यया नाड्या गतिरभिहिता सोऽन्वेष्टव्यः शास्त्राचार्योपदेशैर्ज्ञातव्यः स विशेषेण ज्ञातुमेष्टव्यो विजिज्ञासितव्यः स्वसंवेद्यतामापादयितव्यः । | ब्रह्मचर्यरूप साधन बतलाया गया है और उपासनाके फलभूत कामकी प्राप्तिके लिये मूर्धन्य नाड़ीसे गति बतलायी गयी है उसका अन्वेषण करना चाहिये—शास्त्र और आचार्यके उपदेशोंसे उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; वह विजिज्ञासितव्य—विशेषरूपसे जाननेके लिये इष्ट है अर्थात् स्वसंवेद्यताको प्राप्त करानेयोग्य है । |
| किं तस्यान्वेषणाद्विजिज्ञासनाच्च स्यात् ? इत्युच्यते—स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानं यथोक्तेन प्रकारेण शास्त्राचार्योपदेशेनान्विष्य विजानाति स्वसंवेद्यतामापादयति तस्यैतत्सर्वलोककामावाप्तिः सर्वात्मता फलं भवतीति ह किल प्रजापतिरुवाच । | उसके अन्वेषण और विशेषरूपसे जाननेकी इच्छासे क्या होता है, यह बतलाया जाता है—जो उपर्युक्त प्रकारसे उस आत्माको शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार अन्वेषणकर विशेषरूपसे जान लेता है अर्थात् स्वसंवेद्यताको प्राप्त कर लेता है उसे इन समस्त लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति और सर्वात्मतारूप फलकी प्राप्ति होती है—ऐसा प्रजापतिने कहा । |
| अन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य इति चैष नियमविधिरेव नापूर्वविधिः । एवमन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य इत्यर्थः । दृष्टार्थत्वादन्वे- | 'अन्वेषण करना चाहिये, विशेषरूपसे जानना चाहिये' यह नियमविधि ही है, अपूर्व विधि नहीं है । इसका तात्पर्य यह है कि उसे इस प्रकार अन्वेषण करना चाहिये, इस प्रकार जानना चाहिये, क्योंकि |
छा० उ० २८—