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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| निर्वृत्ता एव सदीक्षाभि-निर्वृत्ततेजोऽबन्नमयत्वाज्जाग्रद्विषयाणाम्। संकल्पमूला हि लोका इति चोक्तम् "समक्लृपतां द्यावापृथिवी" (छा० उ० ७।४।१) इत्यत्र। सर्वश्रुतिषु च प्रत्यगात्मन उत्पत्तिः प्रलयश्च तत्रैव स्थितिश्च "यथा वा अरा नाभौ" (छा० उ० ७।१५।१) इत्यादिनोच्यते। तस्मान्मानसानां बाह्यानां च विषयाणामितरेतरकार्यकारणत्वमिष्यत एव बीजाङ्कुरवत्। यद्यपि बाह्या एव मानसा मानसा एव च बाह्या नानृतत्वं तेषां कदाचिदपि स्वात्मनि भवति। | तो सर्वथा मानसिक प्रतीतियोंसे ही निष्पन्न हुए हैं; क्योंकि जाग्रत्-कालीन विषय सत्‌के ईक्षणसे निष्पन्न तेज, अप् और अन्नमय ही हैं। "समक्लृपतां द्यावापृथिवी" (पृथ्वी और द्युलोककी कल्पना की) इत्यादि स्थानपर यही कहा गया है कि सम्पूर्ण लोक संकल्पमूलक हैं। तथा सम्पूर्ण श्रुतियोंमें "जिस प्रकार नाभिमें अरे समर्पित हैं" इत्यादि दृष्टान्तसे उन सबकी उत्पत्ति प्रत्यगात्मासे ही बतलायी गयी है तथा उसीमें उनके लय और स्थिति भी बतलाये गये हैं। अतः बीज और अङ्कुरके समान मानसिक और बाह्य विषयोंका एक दूसरेके प्रति कार्य कारणभाव माना ही जाता है। यद्यपि बाह्य पदार्थ ही मानसिक है और मानसिक पदार्थ ही बाह्य हैं तो भी स्वात्मामें उनका मिथ्यात्व कभी नहीं होता। |
| ननु स्वप्ने दृष्टाः प्रतिबुद्धस्यानृता भवन्ति विषयाः। | शिष्य—किंतु स्वप्नमें देखे हुए विषय तो जाग्रत् पुरुषके लिये मिथ्या हो जाते हैं। |
| सत्यमेतत्; जाग्रद्बोधापेक्षं तु तदनृतत्वं न स्वतः। तथा | गुरु—यह ठीक है, किंतु उनका मिथ्यात्व जाग्रत्-ज्ञानकी अपेक्षासे है, स्वतः नहीं है। |

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
स्वप्नबोधापेक्षं च जाग्रद्द्दष्टविषयानृतत्वं न स्वतः। विशेषाकारमात्रं तु सर्वेषां मिथ्याप्रत्ययनिमित्तमिति वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्। तान्यप्याकारविशेषतोऽनृतं स्वतः सन्मात्ररूपतया सत्यम्। प्राक्सदात्मप्रतिबोधात् स्वविषयेऽपि सर्वं सत्यमेव स्वप्नदृश्या इवेति न कश्चिद्विरोधः। तस्मान्मानसा एव ब्राह्मलौकिका अरण्यादयः संकल्पजाश्च पित्रादयः कामाः।<br><br>बाह्यविषयभोगवदशुद्धिरहितत्वाच्छुद्धसत्त्वसंकल्पजन्या इति निरतिशयसुखाः सत्याश्चेश्वराणां भवन्तीत्यर्थः। सन्सत्यात्मप्रतिबोधेऽपि रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयः सदात्मस्वरूपतामेव प्रतिपद्यन्त इति सदात्मना सत्या एव भवन्ति ॥ ४ ॥इसी प्रकार स्वप्नज्ञानकी अपेक्षा जाग्रत्कालमें देखे हुए विषयोंका मिथ्यात्व है, स्वतः नहीं। सम्पूर्ण पदार्थोंका जो विशेष आकारमात्र है वही मिथ्याज्ञानका कारण है, क्योंकि वाणीपर अवलम्बित विकार नाममात्र और मिथ्या है, बस तीन रूप ही सत्य हैं। वे तीन रूप भी आकारविशेष होनेसे स्वतः तो मिथ्या ही हैं, किंतु सन्मात्ररूप होनेसे सत्य हैं। सदात्माका साक्षात्कार होनेसे पूर्व तो स्वप्नदृश्य पदार्थोंके समान अपने क्षेत्रमें भी वे सब सत्य ही हैं, इसलिये किसी प्रकारका विरोध सम्भव नहीं है। अतः ब्रह्मलोकसम्बन्धी अरण्यादि और संकल्पजनित पित्रादि काम मानसिक ही हैं।<br><br>बाह्य विषयभोगोंके समान अशुद्धिरहित होनेके कारण वे शुद्धान्तःकरणके संकल्पसे होनेवाले हैं; इसलिये ईश्वरके संकल्प आत्यन्तिक सुखमय और सत्य होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। सत् ही वास्तविक आत्मा है—ऐसा बोध होनेपर भी वे रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान सदात्मरूपताको ही प्राप्त हो जाते हैं। इसलिये सत्स्वरूपसे वे सत्य ही रहते हैं ॥ ४ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥


षष्ठ खण्ड

—: ꕤ :—

हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना

यस्तु हृदयपुण्डरीकगतं यथोक्तगुणविशिष्टं ब्रह्म ब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्नस्त्यक्तबाह्यविषयानृततृष्णः सन्नुपास्ते तस्येयं मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येति नाडीखण्ड आरभ्यते—जो पुरुष ब्रह्मचर्यादि साधनोंसे सम्पन्न और बाह्य विषयोंकी मिथ्या तृष्णासे निवृत्त होकर अपने हृदयकमलमें विराजमान उपर्युक्त गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करता है उसकी यह मूर्धन्य नाडीके द्वारा गति बतलानी है; इसीलिये इस नाडीखण्डका आरम्भ किया जाता है—

अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥

अब, ये जो हृदयकी नाडियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं; क्योंकि यह आदित्य पिङ्गल वर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है और यह लोहितवर्ण है ॥ १ ॥

अथ या एता वक्ष्यमाणा हृदयस्य पुण्डरीकाकारस्य ब्रह्मो-अब, आगे कहे जानेवाले ब्रह्मोपासनाके आश्रयभूत इस पुण्डरीकाकार हृदयकी जो उससे

खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८५५


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
पासनस्थानस्य सम्बन्धिन्यो नाड्यो हृदयमांसपिण्डात्सर्वतो विनिःसृता आदित्यमण्डलादिव रश्मयस्ताश्चैताः पिङ्गलस्य वर्णविशेषविशिष्टस्याणिम्नः सूक्ष्मरसस्य रसेन पूर्णास्तदाकारा एव तिष्ठन्ति वर्तन्त इत्यर्थः ।सम्बद्ध नाडियाँ आदित्यमण्डलसे किरणोंके समान उस हृदयरूप मांसपिण्डसे सब ओर निकली हुई हैं, वे पिंगलनामक एक वर्णविशेषसे युक्त अणिमा अर्थात् सूक्ष्म रसकी हैं; तात्पर्य यह है कि वे उस रससे पूर्ण होकर तदाकार ही रहती हैं।
तथा शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य च रसस्य पूर्णा इति सर्वत्राध्याहार्यम् । सौरेण तेजसा पित्ताख्येन पाकाभिनिर्वृत्तेन कफेनाल्पेन सम्पर्कात्पिङ्गलं भवति सौरं तेजः पित्ताख्यम् । तदेव च वातभूयस्त्वान्नीलं भवति । तदेव च कफभूयस्त्वाच्छुक्लम् । कफेन समतायां पीतम् । शोणितबाहुल्येन लोहितम् । वैद्यकाद्वा वर्णविशेषा अन्वेष्टव्याः, कथं भवन्तीति ?इसी प्रकार वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रससे पूर्ण हैं—इस प्रकार पूर्ण पदका सर्वत्र अध्याहार करना चाहिये। पित्तसंज्ञक सौर तेजसे परिपक्व हुए थोड़े-से कफसे सम्पर्क होनेपर पित्तनामक सौर तेज पिङ्गल वर्ण हो जाता है। वही वातकी अधिकता होनेपर नीला हो जाता है और कफकी अधिकता होनेपर वही शुक्ल हो जाता है। कफसे [ वातकी ] समता होनेपर वह पीला हो जाता है और रक्तकी अधिकता होनेपर लोहित। अथवा वैद्यक शास्त्रसे इन वर्णविशेषोंका—ये किस प्रकार होते हैं, ऐसा—अन्वेषण करना चाहिये।
श्रुतिस्त्वाहादित्यसम्बन्धादेव तत्तेजसो नाडीष्वनुगतस्यैतेकिंतु श्रुतिका तो यही कथन है कि आदित्यके सम्बन्धसे ही, नाड़ियोंमें अनुस्यूत हुए उस तेजके