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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| स्तेषां स एव छान्दोग्य उद्गीथ-शब्दवाच्यः। असौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणवः। प्रणवशब्दवाच्योऽपि स एव बह्वृचानां नान्यः।<br><br>उद्गीथ आदित्यः, कथम् ?<br><br>उद्गीथाख्यमक्षरमोमित्येतदेष हि यस्मात्स्वरन्नुच्चारयन्ननेकार्थत्वाद्धात्तूनाम्, अथवा स्वरन्नाच्छन्नेति; अतोऽसावुद्गीथः सविता ॥ १ ॥ | जो प्रणव है वही छान्दोग्य-उपनिषद्में 'उद्गीथ' शब्दसे कहा गया है। यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; अर्थात् ऋग्वेदियोंके यहाँ प्रणवशब्दवाच्य भी वही है, कोई और नहीं है।<br><br>आदित्य उद्गीथ है—सो कैसे ? क्योंकि यह उद्गीथसंज्ञक अक्षरको 'ॐ' इस प्रकार स्वरन्—उच्चारण करते हुए जाता है [ यद्यपि 'स्वर आक्षेपे' इस धातुसूत्रके अनुसार 'स्वरन्' का अर्थ आक्षेप या गमन करते हुए होना चाहिये तथापि] धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं [इसलिये 'स्वरन्' का अर्थ 'उच्चारण करते हुए' भी होता है] अथवा स्वरन् यानी चलनेवाला सूर्य [ प्राणोंकी प्रवृत्तिके प्रति 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ ] जाता है। अतः यह सविता उद्गीथ ही है ॥ १ ॥ |

रश्मिदृष्टिसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल

एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मीꣳस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥

'मैंने प्रमुखतासे इसका गान किया था; इसीसे मेरे तू एक ही पुत्र है'—ऐसा कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा। अतः तू रश्मियोंका [ आदित्यसे ] भेदरूपसे चिन्तन कर। इससे निश्चय ही तेरे बहुत-से पुत्र होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


| तमेतममु एवाहमभ्यगासिषमाभिमुख्येन गीतवानस्म्यादित्यरश्म्यभेदं कृत्वा ध्यानं कृतवानस्मीत्यर्थः । तेन तस्मात्कारणान्मम त्वमेकोऽसि पुत्र इति ह कौषीतकिः कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकिः पुत्रमुवाचोक्तवान् । अतो रश्मीनादित्यं च भेदेन त्वं पर्यावर्तयात्पर्यावर्तयेत्यर्थः, त्वं योगात् । एवं बहवो वै ते तव पुत्रा भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | ‘निश्चय इसीका मैंने आभिमुख्य ( प्रमुखता ) से गान किया था; अर्थात् मैंने आदित्य और उसकी रश्मियोंका अभेद करके ध्यान किया था । इसी कारणसे मेरे तू एक ही पुत्र है’—ऐसा कौषीतकि—कुषीतकके पुत्र कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा । अतः तू सूर्य और रश्मियोंका भेदपूर्वक चिन्तन कर । श्रुतिमें कर्तृपद ‘त्वं’ होनेके कारण पर्यावर्तयात् [ इस प्रथमपुरुषकी ] क्रियाके स्थानमें ‘पर्यावर्तय’ यह मध्यमपुरुषकी क्रिया समझनी चाहिये । इस प्रकार [ उपासना करनेसे] तेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥ |


मुख्यप्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥

इसके आगे अध्यात्म उपासना है—यह जो मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे, क्योंकि यह ‘ॐ’ इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ गमन करता है ॥ ३ ॥

| अथानन्तरमध्यात्ममुच्यते ।<br>य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथ- | इसके आगे अध्यात्म उपासना<br>कही जाती है—यह जो मुख्य प्राण |