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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

८४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


| नमित्यादिभिर्महद्भिः पुरुषार्थसाधनैः स्तुतत्वाद्ब्रह्मचर्यं परं ज्ञानस्य सहकारिकारणं साधनमित्यतो ब्रह्मविदा यत्नतो रक्षणीयमित्यर्थः । | अर्णवोंको गमन करनेके कारण अरणयायन है—इस प्रकारके पुरुषार्थके महान् साधनोंद्वारा स्तुति किया जानेके कारण ब्रह्मचर्य ज्ञानका परम सहकारी कारण है । अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्मवेत्ताको इसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। |
| तत्तत्र हि ब्रह्मलोकेऽरश्च ह वै प्रसिद्धौ ण्यश्चार्णवौ समुद्रौ समुद्रोपमे वा सरसी तृतीयस्यां भुवमन्तरिक्षं चापेक्ष्य तृतीया द्यौस्तस्यां तृतीयस्यामितोऽस्माल्लोकादारभ्य गण्यमानायां दिवि । तत्तत्रैव चैरम्मिदानं तन्मय ऐरो मण्डस्तेन पूर्णमैरं मदीयं तदुपयोगिनां मदकरं हर्षोत्पादकं सरः । तत्रैव चाश्वत्थो वृक्षः सोमसवनो नामतः सोमाऽमृतं तन्निस्स्रवोऽमृतस्रव इति वा । तत्रैव च ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्यसाधनरहितैर्ब्रह्मचर्यसाधनवद्भ्योऽन्यैर्न जीयत इत्यपराजिता नाम पूः पुरी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्य । | वहाँ उस ब्रह्मलोकमें तीसरे अर्थात् इस लोकसे आरम्भ करनेपर भूलोंक और अन्तरिक्षकी अपेक्षा तीसरे द्युलोकमें प्रसिद्ध 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र अथवा समुद्रके समान दो सरोवर हैं । तथा वहींपर ऐर—इरा अन्नको कहते हैं तन्मय ऐर अर्थात् मण्ड उससे भरा हुआ 'मदीय'—अपना उपयोग करनेवालोंको मद उत्पन्न करनेवाला अर्थात् हर्षोत्पादक सरोवर है । वहीं सोमसवन नामवाला अश्वत्थ वृक्ष है, अथवा सोम अमृतको कहते हैं उसका निस्रवण करनेवाला अमृतस्रावी वृक्ष है । वहाँ उस ब्रह्मलोकमें ही ब्रह्मचर्यरूप साधनसे रहित अर्थात् ब्रह्मचर्यसाधनवानोंसे भिन्न पुरुषोंद्वारा जो नहीं जीती जा सकती ऐसी ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भकी अपराजिता नामवाली पुरी |

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४७


ब्रह्मणा च प्रभुणा विशेषेण मतं निर्मितं तच्च हिरण्मयं सौवर्णं प्रभुविमितं मण्डपमिति वाक्यशेषः ॥ ३ ॥है तथा ब्रह्मारूप प्रभुके द्वारा विशेषरूपसे मित—निर्मित (रची हुई) प्रभुविमित सुवर्णमय 'मण्डप है' ऐसा वाक्यशेष समझना चाहिये॥ ३॥

तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाꣳसर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥

उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको इस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है ॥ ४ ॥

तत्तत्र ब्रह्मलोक एतावर्णावौ यावरण्याख्यावुक्तौ ब्रह्मचर्येण साधनेनानुविन्दन्ति ये तेषामेवैष यो व्याख्यातो ब्रह्मलोकस्तेषां च ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति नान्येषामब्रह्मचर्यपराणां बाह्यविषयासक्तबुद्धीनां कदाचिदपीत्यर्थः ।<br><br>नन्वत्र त्वमिन्द्रस्त्वं यमस्त्वं वरुण इत्यादिभिर्यथा कश्चित्उस ब्रह्मलोकमें जो ये 'अर' और 'ण्य' नामवाले दो समुद्र कहे गये हैं इन्हें जो ब्रह्मचर्यरूप साधनके द्वारा प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है । तथा उन ब्रह्मचर्यसाधनसम्पन्न ब्रह्मवेत्ताओंकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है; ब्रह्मचर्यमें तत्पर न रहनेवाले अन्य बाह्य विषयासक्तबुद्धि पुरुषोंकी स्वेच्छागति कभी नहीं होती ।<br><br>किंतु यहाँ कुछ लोगोंका मत है कि जिस प्रकार 'तुम इन्द्र हो,