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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

| ८०६ | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ८ |

८०६छान्दोग्योपनिषद्अध्याय ८
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
ष्ठानमित्यर्थः, यथा विष्णोः शालग्रामः ।<br><br>अस्मिन् हि स्वविकारशुङ्गे देहे नामरूपव्याकरणाय प्रविष्टं सदाख्यं ब्रह्म जीवेनात्मनेत्युक्तम् । तस्मादस्मिन्हृदयपुण्डरीके वेश्मन्युपसंहृतकरणैर्बाह्यविषयविरक्तैर्विशेषतो ब्रह्मचर्यसत्यसाधनाभ्यां युक्तैर्वक्ष्यमाणगुणवद्ध्यायमानैर्ब्रह्मोपलभ्यत इति प्रकरणार्थः ।<br><br>दहरोऽल्पतरोऽस्मिन्दहरे वेश्मनि वेश्मनोऽल्पत्वात्तदन्तर्वर्तिनोऽल्पतरत्वं वेश्मनोऽन्तराकाश आकाशाख्यं ब्रह्म । आकाशो वै नामेति हि वक्ष्यति ।<br><br>आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वसर्वगतत्वसामान्याच्च । तस्मिन्ना-ग्रामशिला विष्णुकी उपलब्धिकी अधिष्ठान होती है—ऐसा इसका तात्पर्य है।<br><br>इस अपने विकारभूत कार्य--देहमें सत्संज्ञक ब्रह्म नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये जीवात्मभावसे अनुप्रविष्ट है—यह कहा जा चुका है। इसीसे जिन्होंने इस हृदयकमलरूप भवनमें अपने इन्द्रियवर्गका उपसंहार कर दिया है उन बाह्य विषयोंसे विरक्त, विशेषतः ब्रह्मचर्य एवं सत्यरूप साधनोंसे सम्पन्न तथा आगे बतलाये जानेवाले गुणोंसे युक्त पुरुषोंद्वारा चिन्तन किये जानेपर ब्रह्मकी उपलब्धि होती है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है।<br><br>इस सूक्ष्म गृहमें दहर—अत्यन्त सूक्ष्म अन्तराकाश यानी आकाशसंज्ञक ब्रह्म है। गृह सूक्ष्म होनेके कारण उसके अन्तर्वर्ती आकाशका सूक्ष्मतरत्व सिद्ध होता है। 'आकाश ही नाम-रूपका निर्वाह करनेवाला है' ऐसा श्रुति कहेगी भी। आकाशके समान अशरीर होनेके कारण तथा सूक्ष्मत्व और सर्वगतत्वमें उससे समानता होनेके कारण [ उसे आकाश कहा

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७


काशाख्ये यदन्तर्मध्ये तदन्वेष्टव्यम् । तद्भाव तदेव च विशेषेण जिज्ञासितव्यं गुर्वाश्रयश्रवणाद्युपायैरन्विष्य च साक्षात्करणीयमित्यर्थः ॥ १ ॥गया है ] । उस आकाशसंज्ञक तत्त्वके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये, तथा उसीकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये, अर्थात् गुरुके आश्रय तथा श्रवणादि उपायोंसे अन्वेषण करके उसका साक्षात्कार करना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥

—:०:—

तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥

उस (गुरु) से यदि [ शिष्यगण ] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो अन्तराकाश है उसके भीतर क्या वस्तु है जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये?—तो [ इस प्रकार पूछनेवाले शिष्योंके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ २ ॥

तं चेदेवमुक्तवन्तमाचार्यं यदि ब्रूयुरन्तेवासिनश्चोदययुः, कथम् ? यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे परिच्छिन्नेऽन्तर्दहरं पुण्डरीकं वेश्म ततोऽप्यन्तरल्पतर एवाकाशः । पुण्डरीक एव वेश्मनि तावत्किंइस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें अर्थात् शङ्का करें, किस प्रकार शङ्का करें?—इस परिच्छिन्न ब्रह्मपुरमें जो यह अन्तर्वर्ती कमलाकार सूक्ष्म गृह है उसके भीतर तो उससे भी सूक्ष्मतर आकाश है । प्रथम तो उस कमलाकार गृहमें ही क्या वस्तु रह सकती है ? फिर उससे भी