छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७
| ७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७ |
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| कथं पित्रादिशब्दानां प्रसिद्धार्थोत्सर्गेण प्राणविषयत्वमिति उच्यते । सति प्राणे पित्रादिषु पित्रादिशब्दप्रयोगात्तदुत्क्रान्तौ च प्रयोगाभावात् । कथं तत् ? इत्याह— | 'पितृ' आदि शब्दोंके प्रसिद्ध अर्थका त्याग करके उनका प्राणविषयक होना कैसे सम्भव है ! ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-- क्योंकि प्राण रहनेपर ही पिता आदिके लिये 'पितृ' आदि शब्दका प्रयोग किया जाता है, उसके उत्क्रमण करनेपर इस प्रकारका प्रयोग भी नहीं होता । किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं— |
स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥
यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो [ उसके समीपवर्ती लोग ] उससे कहते हैं—'तुझे धिक्कार है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है' ॥ २ ॥
| स यः कश्चित्पित्रादीनामन्यतमं यदि तं भृशमिव तदननुरूपमिव किञ्चिद्वचनं त्वङ्कारा- | जो कोई कि पिता आदिमेंसे किसीके प्रति यदि कोई 'भृशमिव'--उनके अननुरूप कोई त्वंकारादि (अरे-तू आदि) से युक्त वचन बोलता |
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१
| दियुक्तं प्रत्याह तदैनं पार्श्वस्था आहुर्विवेकिनो धिक्त्वास्तु धिगस्तु त्वामित्येवम्। पितृहा वै त्वं पितुर्हन्तेत्यादि ॥ २ ॥ | है तो उसके समीपवर्ती विचारशील लोग उससे 'धिक्त्वास्तु'—तुझे धिक्कार है—ऐसा कहते हैं। 'तू निश्चय ही पितृहा—पिताका हनन करनेवाला है' इत्यादि ॥ २ ॥ |
अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥
किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर गये हैं उन पिता आदिको यदि वह शूलसे एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पितृहा है' 'तू मातृहा है' 'तू भ्रातृहा है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा कुछ नहीं कहते ॥ ३ ॥
| अथैनानेवोत्क्रान्तप्राणांस्त्यक्तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं समस्य व्यतिषन्दहेद्यत्यस्य सन्दहेदेवमप्यतिक्रूरं कर्म समास-व्यासादिप्रकारेण दहनलक्षणं तद्देहसम्बद्धमेव कुर्वाणं नैवैनं ब्रूयुः पितृहेत्यादि। तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामवगम्यत एतत्पित्राद्याख्योऽपि प्राण एवेति ॥ ३॥ | किंतु प्राण निकल जानेपर—देहका त्याग कर देनेपर इन्हींको यदि वह शूलसे समास—एकत्रित करके व्यतिषन्दहन करे अर्थात् छिन्न-भिन्न करके जलावे; उनके देहसे सम्बद्ध समास-व्यासादि क्रमसे दहन करारूप ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म करनेपर भी उससे 'तू पितृहा है' इत्यादि नहीं कहते। अतः अन्वय-व्यतिरेकसे यह ज्ञात होता है कि यह पिता आदि नाम-वाला भी प्राण ही है ॥ ३ ॥ |
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छा० उ० २५—