संग्रह पर लौटें


छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]
पृष्ठ 52स्थायी लिंक
४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तिरे । संपूूर्वस्य यततेः सङ्ग्रामार्थत्वमिति सङ्ग्रामं कृतवन्त इत्यर्थः । | हरणरूप जिस किसी निमित्तसे संयत हुए । 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'यत्' धातुका अर्थ संग्राम होनेके कारण इसका अभिप्राय 'उन्होंने संग्राम किया'—ऐसा समझना चाहिये । |
| शास्त्रीयप्रकाशवृत्त्यभिभवनाय प्रवृत्ताः स्वाभाविक्यस्तमोरूपा इन्द्रियवृत्तयोऽसुराः । तथा तद्विपरीताः शास्त्रार्थविषयविवेकज्योतिरात्मानो देवाः स्वाभाविकतमोरूपासुराभिभवनाय प्रवृत्ता इत्यन्योन्याभिभवोद्भवस्वरूपः सङ्ग्राम इव सर्वप्राणिषु प्रतिदेहं देवासुरसङ्ग्रामोऽनादिकालप्रवृत्त इत्यभिप्रायः । स इह श्रुत्याख्यायिकारूपेण धर्माधर्मोत्पत्तिविवेकविज्ञानाय कथ्यते प्राणविशुद्धिविज्ञानविधिपरतया । | शास्त्रीय प्रकाशवृत्तिका पराभव करनेके लिये प्रवृत्त हुई स्वभावसे ही तमोरूपा इन्द्रियवृत्तियाँ असुर हैं । तथा उनके विपरीत शास्त्रार्थविषयक विवेकज्योतिःस्वरूप देवगण स्वाभाविक तमोरूप असुरोंका पराभव करनेके लिये प्रवृत्त हैं । इस प्रकार परस्परकी वृत्तियोंके अभिभव-उद्भवस्वरूप संग्रामके समान यह देवासुर-संग्राम अनादिकालसे सम्पूर्ण प्राणियोंमें प्रत्येक देहमें होता आ रहा है—ऐसा इसका अभिप्राय है । यहाँ श्रुति धर्माधर्मकी उत्पत्तिके विवेकका बोध करानेके लिये प्राणोंकी विशुद्धिके विज्ञानका विधान करते हुए आख्यायिका-रूपसे उसीका वर्णन कर रही है । |
| अत उभयेऽपि देवासुराः प्रजापतेरपत्यानीति प्राजापत्याः। प्रजापतिःकर्मज्ञानाधिकृतः पुरुषः | इसीसे ये देवता और असुर, दोनों प्रजापतिके पुत्र हैं इसलिये प्राजापत्य, "पुरुष ही उक्थ है, यही महान् प्रजापति है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार प्रजापति, कर्म और ज्ञान |
पृष्ठ 53स्थायी लिंक
खण्ड २ ] • शाङ्करभाष्यार्थ • ४९
| “पुरुष एवोक्थमयमेव महान्प्रजापतिः” इति श्रुत्यन्तरात्। तस्य हि<br><br>शास्त्रीयाः स्वाभावक्यश्च करणवृत्तयो विरुद्धा अपत्यानीव, तदुद्भवत्वात्।<br><br>तत्तत्रोत्कर्षापकर्षलक्षणनिमित्ते<br><br>ह देवा उद्गीथमुद्गीथभक्त्युपलक्षितमौद्गात्रं कर्माजह्रुराहृतवन्तः।<br><br>तस्यापि केवलस्याहरणासंभवा-<br><br>ज्ज्योतिष्टोमाद्याहृतवन्त इत्यभिप्रायः। तत्किमर्थमाजहुः ? इत्युच्यते—अनेन कर्मणैनानसुरानभिभविष्याम इत्येवमभिप्रायाः सन्तः॥ १॥ | ( उपासना ) के अधिकारी पुरुषका नाम है [ ब्रह्माका नहीं ]। उसीकी शास्त्रीय और स्वाभाविक—ये परस्पर-विरुद्ध इन्द्रियवृत्तियाँ संतानके समान हैं, क्योंकि इनका आविर्भाव उसीसे होता है।<br><br>उत्कर्ष-अपकर्षरूप निमित्तके कारण होनेवाले उस संग्राममें देवताओंने उद्गीथका यानी उद्गीथ-भक्तिसे उपलक्षित उद्गाताके कर्मका आहरण—अनुष्ठान किया। अकेले उसीका अनुष्ठान होना असम्भव होनेके कारण उन्होंने ज्योतिष्टोम आदिका अनुष्ठान किया—ऐसा इसका अभिप्राय है। उन्होंने उसका अनुष्ठान किसलिये किया ? यह बतलाया जाता है—इस कर्मसे हम इन असुरोंका पराभव कर देंगे—ऐसे अभिप्रायवाले होकर [ उन्होंने उद्गीथका अनुष्ठान किया ] ॥१॥ |
घ्राणादिका सदोषत्व
| यदा च तदुद्गीथं कर्माजिहीर्षवस्तदा— | जिस समय उन्होंने उस उद्गीथ-कर्मका अनुष्ठान करना चाहा उस समय— |