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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४६८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५]

४६८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५]


| ज्यैष्ठ्यादिगुणपूगमात्मनो गमयत्वहमेवेदं सर्वं जगदसानि भवानि प्राणवत् । इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥ | मन्थरूप प्राण मुझे भी अपने ज्येष्ठत्व आदि गुणसमूहको प्राप्त करावे। प्राणके समान मैं भी यह सम्पूर्ण जगत्स्वरूप हो जाऊँ । 'इति' शब्द मन्त्रकी समाप्तिके लिये है ॥६॥ |


अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति । तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति । वयं देवस्य भोजनमित्याचामति । श्रेष्ठँसर्वधातममित्याचामति । तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति । निर्णिज्य कँसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः । स यदि स्त्रियं पश्येत्स समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥

फिर वह इस ऋचासे* पादशः [उस मन्थका] भक्षण करता है। 'तत्सवितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'वयं देवस्य भोजनम्' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'श्रेष्ठँ सर्वधातमम्' ऐसा कहकर भोजन करता है; तथा 'तुरं भगस्य धीमहि' ऐसा कहकर कंस (कटोरे) या चमस (चम्मच) को धोकर सारा मन्थलेप पी जाता है। तत्पश्चात् वह अग्निके पीछे चर्म अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञभूमि) पर वाणीका संयम कर (अनिष्ट स्वप्नदर्शनसे) अभिभूत न होता हुआ शयन करता है। उस समय यदि वह [स्वप्नमें] स्त्रीको देखे तो वैसा समझे कि कर्म सफल हो गया ॥७॥

| अथानन्तरं खल्वेतया वक्ष्यमाणयर्चा पच्छः पादश आचा- | इसके अनन्तर वह इस कही जानेवाली ऋचासे पादशः आचमन—भक्षण करता है; अर्थात् इस |


* इस ऋचाका अर्थ इस प्रकार है—'हम प्रकाशमान सविताके उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही सविता देवताके स्वरूपका ध्यान करते हैं।'

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ४६९
मति भक्षयति मन्त्रस्यैकैकेन पादेनैकेकं ग्रासं भक्षयति । तद्भोजनं सवितुः सर्वस्य प्रसवितुः प्राणमादित्यं चैकीकृत्योच्यते, आदित्यस्य वृणीमहे प्रार्थयेमहि मन्थरूपम् । येनान्नेन सावित्रेण भोजनेनोपभुक्तेन वयं सवितृस्वरूपापन्ना भवेमेत्यभिप्रायः । देवस्य सवितुरिति पूर्वेण संबन्धः श्रेष्ठं प्रशस्यतमं सर्वान्नेभ्यः सर्वधातमं सर्वस्य जगतो धारयितृतममतिशयेन विधातृतममिति वा । सर्वथा भोजनविशेषणम् । तुरं त्वरं तूर्णं शीघ्रमित्येतत् । भगस्य देवस्य सवितुः स्वरूपमिति शेषः । धीमहि चिन्तयेमहि विशिष्टभोजनेन संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्त इत्यभिप्रायः । अथवा भगस्य श्रियः कारणं महत्त्वं प्राप्तुं कर्ममन्त्रके एक-एक पादसे एक-एक ग्रास भक्षण करता है । हम सविता—सबका प्रसव करनेवाले आदित्यके उस मन्थरूप भोजनकी प्रार्थना करते हैं—यहाँ प्राण और आदित्यको एक मानकर ऐसा कहा गया है—जिस अन्न अर्थात् सविता देवतासे उपभोग किये हुए भोजनद्वारा हम सूर्यस्वरूपको प्राप्त होंगे—ऐसा इसका अभिप्राय है । 'देवस्य सवितुः' इस प्रकार 'देवस्य' पदका पहले [ सवितुः पद ] से सम्बन्ध है । श्रेष्ठ—समस्त अन्नोंकी अपेक्षा प्रशस्यतम, 'सर्वधातमम्'—समस्त जगत्के उत्कृष्ट धारयिता अथवा सम्पूर्ण जगत्के अतिशय विधाता ( उत्पत्तिकर्ता ) [—इस प्रकार कुछ भी अर्थ किया जाय ] यह सर्वथा भोजनका विशेषण है । हम तुर-त्वर--तूर्णं अर्थात् शीघ्र ही भग—सविता देवताके स्वरूपका—'स्वरूप' शब्द यहाँ शेष है—[ अर्थात् यह ऊपरसे लाना पड़ता है ] ध्यान—चिन्तन करते हैं; तात्पर्य यह है कि उस विशिष्ट भोजनसे संस्कारयुक्त और शुद्धचित्त होकर हम उसके स्वरूपका ध्यान करते हैं । अथवा भग यानी श्रीके कारणभूत महत्त्वको प्राप्त करनेके