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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| प्राणैरित्यर्थः । तथैतस्यैवाक्षरस्य रसेन व्रीहियवादिरसनिर्वृत्तेन हविषेत्यर्थः; यागहोमाद्यक्षरेण क्रियते । तच्चादित्यमुपतिष्ठते । ततो वृष्ट्यादिक्रमेण प्राणोऽन्नं च जायते । प्राणैरन्नेन च यज्ञस्तायते । अत उच्यते 'अक्षरस्य महिम्ना रसेन' इति ॥९॥ | आदिके प्राणोंसे ही तथा इस अक्षरके रस—व्रीहि-यवादिरससे निष्पन्न हुए हविष्यसे ही [वैदिककर्म सम्पन्न होते हैं] । [तो क्या वे प्राण और हवि उस अक्षरके विकार हैं ? इसपर कहते हैं—] वे याग-होमादि इस अक्षरके उच्चारणपूर्वक ही किये जाते हैं । वे कर्म आदित्यको प्राप्त होते हैं । फिर उससे वृष्टि आदि क्रमसे प्राण और अन्नकी उत्पत्ति होती है तथा प्राण और अन्नसे यज्ञका अनुष्ठान किया जाता है। इसीलिये 'इस अक्षरकी महिमासे और रससे' ऐसा कहा गया है ॥९॥ |

उद्गीथविद्याके जानने और न जाननेवालेके कर्मका भेद

| तत्राक्षरविज्ञानवतः कर्म कर्तव्यमिति स्थितमाक्षिपति — | ऐसी अवस्थामें जिसे अक्षर-विज्ञान है उसीको कर्म करना चाहिये—इस अवस्थामें श्रुति आक्षेप करती है— |

तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ।
नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति
श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेत-
स्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥१०॥

जो इस (अक्षर) को इस प्रकार जानता है और जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा [कर्म] करते हैं । किंतु विद्या और अविद्या—दोनों भिन्न-भिन्न [फल देनेवाली] हैं । जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है वही प्रबलतर होता है, इस प्रकार निश्चय ही यह सब इस अक्षरकी ही व्याख्या है ॥ १० ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तेनाक्षरेणोभौ यश्चैतदक्षरमेवं व्याख्यातं वेद यश्च कर्ममात्रविद्वक्षरयाथात्म्यं न वेद तावुभौ कुरुतः कर्म। तयोश्च कर्मसामर्थ्यादेव फलं स्यात्किं तत्राक्षरयाथात्म्यविज्ञानेनेति। दृष्टं हि लोके हरीतकीं भक्षयतोस्तद्रसाभिज्ञेतरयोर्विरेचनम्। नैवम्, यस्मान्नाना तु विद्या चाविद्या च भिन्ने हि विद्याविद्ये। तु शब्दः पक्षव्यावृत्त्यर्थः।उस अक्षरके द्वारा दोनों ही प्रकारके लोग कर्म करते हैं; [कौन-कौन ? ] ( १ ) जो इस अक्षरको जैसी कि ऊपर व्याख्या की गयी है उसी प्रकार जानते हैं; और ( २ ) जो केवल कर्मको ही जानते हैं, अक्षरके यथार्थ स्वरूपको नहीं जानते, वे दोनों ही कर्मानुष्ठान करते हैं। [ अब यदि कोई कहे कि ] उन्हें कर्मके सामर्थ्यसे ही फलकी प्राप्ति हो जायगी, अक्षरके याथात्म्यको जाननेकी क्या आवश्यकता है, क्योंकि लोकमें हरीतकी (हर्रे) के रसको जाननेवाले और न जाननेवाले इन दोनोंको ही हरीतकी खानेसे दस्त होते देखे गये हैं—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि विद्या और अविद्या इन दोनोंमें भेद है—विद्या और अविद्या दोनों ही भिन्न-भिन्न हैं। 'तु' शब्द पक्षकी व्यावृत्ति करनेके लिये है।
न ओंकारस्य कर्माङ्गत्वमात्रविज्ञानमेव रसतमाप्तिसमृद्धिगुणवद्विज्ञानम्, किं तर्हि ? ततोऽभ्यधिकम्। तस्मात्तदङ्गाधिक्यात्फलाधिक्यं युक्तमित्यभिप्रायः। दृष्टं हि लोके वणिक्छबरयोःओंकार रसतम् तथा आप्ति और समृद्धि इन गुणोंसे युक्त है—ऐसा जानना उसे केवल कर्माङ्गमात्र जाननेके ही तुल्य नहीं है, तो फिर कैसा है ? उससे सब प्रकार बढ़ा हुआ है। अतः अभिप्राय यह है कि कर्माङ्गज्ञानसे उत्कृष्ट होनेके कारण उसके फलकी उत्कृष्टता भी उचित ही है। लोकमें यह देखा ही गया है कि व्यापारी और भील—