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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

३४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य<br><br>एवं यथोक्तं वेद ॥ ३ ॥अर्थको जानता है वह कीर्ति¹, यश² और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ३ ॥

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प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥

प्राण ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुरूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ४ ॥

चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥

चक्षु ही मनःसंज्ञक ब्रह्मका चौथा पाद है । वह आदित्यरूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ५ ॥

श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च । भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥

श्रोत्र ही मनोरूप ब्रह्मका चौथा पाद है । वह दिशारूप ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है । जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ॥ ६ ॥


१. प्रत्यक्ष प्रशंसा । २. परोक्ष प्रशंसा ।

खण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३


| तथा प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना गन्धाय भाति च तपति च । तथा चक्षुरादित्येन रूपग्रहणाय श्रोत्रं दिग्भिः शब्दग्रहणाय । विद्याफलं समानम् । सर्वत्र ब्रह्मसंपत्तिरदृष्टं फलं य एवं वेद । द्विरुक्तिर्दर्शनसमाप्त्यर्था॥४-६॥ | इसी प्रकार प्राण ही ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुद्वारा गन्धग्रहणके लिये प्रकाशित होता और तपता है [ अर्थात् उत्साहित होता है ] । इसी तरह चक्षु रूपग्रहणके लिये आदित्यद्वारा और श्रोत्र शब्दग्रहणके लिये दिशाओंके द्वारा उत्साहित होता है । इस प्रकारकी उपासनाका फल सर्वत्र समान है । जो ऐसा जानता है उसे सर्वत्र ब्रह्मप्राप्तिरूप 'अदृष्ट फल मिलता है । 'य एवं वेद, य एवं वेद' यह द्विरुक्ति विद्याकी समाप्तिके लिये है ॥ ४–६ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥

एकोनविंश खण्ड

आदित्य और अण्डदृष्टिसे अध्यात्म एवं आधिदैविक उपासना

आदित्यो ब्रह्मणः पाद उक्त इति तस्मिन्सकलब्रह्मदृष्ट्यर्थमिदमारभ्यते—आदित्यको ब्रह्मका पाद बतलाया गया है; अतः उसमें समस्त ब्रह्मकी दृष्टि करनेके लिये इस खण्डका आरम्भ किया जाता है—

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्। तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥

आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है; उसीकी व्याख्या की जाती है। पहले यह असत् ही था। वह सत् (कार्याभिमुख) हुआ। वह अङ्कुरित हुआ। वह एक अण्डेमें परिणत हो गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा। फिर वह फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये ॥ १ ॥


(पार्श्व-टिप्पणी: असत्कार्यवाद-समीक्षा)

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेश उपदेशस्तस्योपन्याख्यानं क्रियते स्तुत्यर्थम्। असद्व्याकृतनामरूपमिदं जगदशेषमग्रे प्रागवस्थाया-'आदित्य ब्रह्म है' यह आदेश-उपदेश है। उस आदित्यका स्तुतिके लिये उपाख्यान किया जाता है। पहले अर्थात् अपनी उत्पत्तिसे पूर्वकी अवस्थामें यह सम्पूर्ण जगत् असत्—जिसके नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं हुई है ऐसा था; सर्वथा असत [शून्य]

खण्ड १९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५


संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
म्युत्पत्तेरासीन्न त्वसदेव; 'कथमसतः सज्जायेत' इत्यसत्कार्यत्वस्य प्रतिषेधात् ।ही नहीं था; क्योंकि 'असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है' इस प्रकार [ आगे छठे अध्यायमें ] श्रुतिने असत्कार्यत्वका प्रतिषेध किया है ।
नन्विहासदेवेति विधानाद्विकल्पः स्यात् ।पूर्व०—किंतु यहाँ 'असदेव आसीत्' ऐसा विधान होनेके कारण विकल्प* हो सकता है ।
न; क्रियास्वेव वस्तुनि विकल्पानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि क्रियाओंके समान वस्तुमें विकल्प होना सम्भव नहीं है ।
कथं तर्हीदमसदेवेति ?पूर्व०—तो फिर 'इदम् असत् एव' यह वाक्य क्यों कहा गया है ?
नन्ववोचामाव्याकृतनामरूपत्वादसदिवासदिति ।सिद्धान्ती—हम कह चुके हैं न, कि नाम-रूपकी अभिव्यक्तिसे रहित होनेके कारण मानो असत्की तरह 'असत्' था ।
नन्वेवशब्दोऽवधारणार्थः ।पूर्व०—किंतु 'एव' शब्द तो निश्चयार्थक है !
सत्यमेवम् , न तु सत्त्वाभावमवधारयति ।सिद्धान्ती—यह तो ठीक है, किंतु यह सत्ताके अभावका निश्चय नहीं करता ।
किं तर्हि ?पूर्व०—तो फिर क्या करता है ?
व्याकृतनामरूपाभावमवधारयति; नामरूपव्याकृतविषये सच्छब्दप्रयोगो दृष्टः । तच्च नामरूपव्याकरणमादित्यायत्तं प्रायशोसिद्धान्ती—व्यक्त नाम-रूपके अभावका निश्चय करता है । 'सत्' शब्दका प्रयोग, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन पदार्थोंके विषयमें देखा गया है; और जगत्के नाम-रूपकी अभिव्यक्ति प्रायः आदित्यके अधीन

* अर्थात् सृष्टिके पूर्व यह सब कुछ 'असत्' अथवा सत्' था, इस प्रकार विकल्प हो सकता है ।