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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

३३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


अथ यत्तपो दानमार्जवमहिंसासत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः; धर्मपुष्टिकरत्वसामान्यात् ॥ ४ ॥तथा पुरुषके जो तप, दान, आर्जव, अहिंसा और सत्यभाषण [ आदि गुण ] हैं, वे ही इसकी दक्षिणा हैं; क्योंकि धर्मकी पुष्टि करनेमें [ दक्षिणाके साथ ] उनकी तुल्यता है ॥ ४ ॥

—: ० :—

यस्माच्च यज्ञः पुरुषः—क्योंकि पुरुष यज्ञ है—

तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवावभृथः ॥ ५ ॥

इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई' वह इसका पुनर्जन्म ही है; तथा मरण ही अवभृथस्नान है ॥ ५ ॥

तस्मात्तं जनयिष्यति माता यदा, तदाहुरन्ये सोष्यतीति तस्य मातरम् यदा च प्रसूता भवति, तदाऽसोष्ट पूर्तिकेति, विधियज्ञ इव सोष्यति सोमं देवदत्तोऽसोष्ट सोमं यज्ञदत्त इति, अतः शब्दसामान्याद्वा पुरुषो यज्ञः। पुनरुत्पादनमेवास्य तत्पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य यत्सोष्यत्यसोष्टेतिशब्द-इसीसे जब माता उसे जन्म देनेवाली होती है, तब दूसरे लोग उसकी माताके विषयमें कहते हैं कि 'यह प्रसूता होगी' और जब वह प्रसूता होती है तो 'यह प्रसूता हुई अर्थात् पूर्णिका हुई' ऐसा कहते हैं, जैसे कि विधियज्ञमें 'देवदत्त सोमाभिषव (सोमरसका पान या साधन) करेगा' अथवा 'यज्ञदत्तने सोमाभिषव किया' ऐसा कहते हैं। इस प्रकार 'सोष्यति' तथा 'असोष्ट' शब्दोंमें समानता होनेके कारण पुरुष यज्ञ है। विधियज्ञके समान इस पुरुषसंज्ञक यज्ञका जो 'सोष्यति' और 'असोष्ट' इन शब्दोंसे सम्बद्ध होना है वह पुनरुत्पादन

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३


| संबन्धित्वं विधियज्ञस्येव ।<br>किं च तन्मरणमेवास्य पुरुष-<br>यज्ञस्यावभृथः; समाप्तिसामा-<br>न्यात् ॥ ५ ॥ | ही है; तथा मरण ही इस पुरुषसंज्ञक<br>यज्ञका अवभृथस्नान है, क्योंकि<br>समाप्तिमें इन (मरण और अवभृथ-<br>स्नान) दोनोंकी तुल्यता है ॥ ५ ॥ |


— : ० : —

तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायो-<br>क्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं<br>प्रतिपद्ये ताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति<br>तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ६ ॥

घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित (अक्षय) है, ( २ ) अच्युत (अविनाशी) है और ( ३ ) अतिसूक्ष्म प्राण है।' तथा इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं ॥ ६ ॥

| तद्धैतद्यज्ञदर्शनं घोरो नामत<br>आङ्गिरसो गोत्रतः कृष्णाय<br>देवकीपुत्राय शिष्यायोक्त्वोवाच<br>तदेतत्त्रयमित्यादिव्यवहितेन सं-<br>बन्धः । स चैतद्दर्शनं श्रुत्वापि-<br>पास एवान्याभ्यो विद्याभ्यो<br>बभूव । इत्थं च विशिष्टेयं विद्या<br>यत्कृष्णस्य देवकीपुत्रस्यान्यां | इस यज्ञदर्शनको आङ्गिरस गोत्र-<br>वाले घोरनामक ऋषिने अपने शिष्य<br>देवकीपुत्र कृष्णके प्रति कहकर फिर<br>कहा। इस वाक्यका 'तदेतत्त्रयम्'<br>इस व्यवधानयुक्त वाक्यसे सम्बन्ध<br>है। तथा वह कृष्ण तो इस यज्ञ-<br>दर्शनका श्रवण कर फिर अन्य<br>विद्याओंके प्रति तृणारहित हो<br>गया। 'यह विद्या ऐसी विशिष्ट<br>गुणसम्पन्ना है कि यह अन्य विद्याओं-<br>के प्रति देवकीपुत्र कृष्णकी तृष्णा- |