छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| तत्साधनैरिदं यद्गृह्यते प्रत्यक्षादि प्रमाणैः श्रितमाश्रितं स्थितमित्यर्थः ॥ १ ॥ | प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे ग्रहण किया जाता है, अपने साधनोंके सहित श्रित—आश्रित अर्थात् स्थित है ॥ १ ॥ |
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तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञीनाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदँरोदिति सोऽहमेतमेवं वायुंदिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदँरुदम्॥२॥
उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे जानता है पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं करता। वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे जानता हूँ; अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ ॥ २ ॥
| तस्यास्य प्राची दिक्प्राग्गतो भागो जुहूर्नाम जुह्वत्यस्यां दिशि कर्मिणः प्राङ्मुखाः सन्त इति जुहूर्नाम। सहमाना नाम सहन्तेऽस्यां पापकर्मफलानि यमपुर्यां प्राणिन इति सहमाना नाम दक्षिणा दिक्। तथा राज्ञी नाम प्रतीची पश्चिमा दिक्, | उस इस कोशकी प्राची दिशा—पूर्वकी ओरका भाग, 'जुहू' नामवाला है। कर्मठ लोग इस दिशामें पूर्वाभिमुख होकर हवन करते हैं इसलिये यह 'जुहू' नामवाली है। दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, क्योंकि इसी दिशामें जीव यमपुरीमें अपने पापकर्मोंके फलरूप दुःखको सहन करते हैं, इसलिये दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामवाली है। तथा प्रतीची यानी पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामकी है; वरुण राजासे |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९
| भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| राज्ञी राज्ञा वरुणेनाधिष्ठिता संध्यारागयोगाद्वा। सुभूता नाम भूतिमद्भििरीश्वरकुबेरादिभिरधिष्ठितत्वात्सुभूता नामोदीची।<br><br>तासां दिशां वायुर्वत्सो दिग्जत्वाद्वायोः, पुरोवात इत्यादिदर्शनात्। यः कश्चित्पुत्रदीर्घजीविताथ्र्येवं यथोक्तगुणं वायुं दिशां वत्सममृतं वेद, स न पुत्ररोदं पुत्रनिमित्तं रोदनं न रोदिति पुत्रो न म्रियत इत्यर्थः।<br><br>यत एवं विशिष्टं कोशादिग्वत्सविषयं विज्ञानमतः सोऽहं पुत्रजीविताथ्र्यैवमेतं वायुं दिशां वत्सं वेद जाने। अतो मा पुत्ररोदं मा रुदं पुत्रमरणनिमित्तम्। पुत्ररोदो मम माभूदित्यर्थः॥२॥ | अधिष्ठित होनेके कारण अथवा सायंकालिक राग (लालिमा) के योगसे पश्चिम दिशा 'राज्ञी' है। उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है। ईश्वर, कुबेर आदि भूतिसम्पन्न देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है।<br><br>उन दिशाओंका वायु वत्स है, क्योंकि वायु दिशाओंसे ही उत्पन्न होनेवाला है। जैसा कि पूर्वीय वायु आदि प्रयोगोंसे देखा जाता है। वह कोई भी पुरुष, जो कि पुत्रके दीर्घजीवनकी कामनावाला है, यदि इस प्रकार पूर्वोक्त गुणवाले दिशाओंके वत्स अमृतरूप वायुको जानता है वह पुत्ररोद—पुत्रनिमित्तक रोदन नहीं करता। अर्थात् उसका पुत्र नहीं मरता, क्योंकि कोश और दिशाओंके वत्ससे सम्बन्ध रखनेवाला विज्ञान ऐसे गुणवाला है अतः अपने पुत्रके जीवनकी कामनावाला मैं दिशाओंके वत्सरूप इस वायुको इस प्रकार जानता हूँ; इसलिये पुत्ररोद—पुत्रके मरणसे होनेवाला रोदन न करूँ। अर्थात् मुझे पुत्रके लिये रोनेका प्रसङ्ग प्राप्त न हो॥ २ ॥ |