सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

३०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तथा जीवाज्जातं जीवजं जरायुजमित्येतत्पुरुषपश्वादि । उद्भिज्जमुद्भिनत्तीत्युद्भिदुत्स्थावरं ततो जातमुद्भिज्जं धाना वोद्भिद्ततो जायत इत्युद्भिज्जं स्थावरबीजं स्थावराणां बीजमित्यर्थः । स्वेदजसंशोकजयोरण्डजोद्भिज्जयोरेव यथासंभवमन्तर्भावः । एवं ह्यवधारणं त्रीण्येव बीजानीत्युपपन्नं भवति ॥ १ ॥ | इसी प्रकार जीवसे उत्पन्न हुआ जीवज यानी जरायुज पुरुष एवं पशु आदि तथा उद्भिज्ज—जो पृथिवीको ऊपरकी ओर भेदन करता है उसे उद्भिद् यानी स्थावर कहते हैं, उससे उत्पन्न हुएका नाम उद्भिज्ज है; अथवा धाना (बीज) उद्भिद् है उससे उत्पन्न हुआ उद्भिज्ज स्थावरबीज अर्थात् स्थावरोंका बीज है। स्वेदज और संशोकज (ऊष्मासे उत्पन्न होनेवाले) जीवोंका यथासम्भव अण्डज और उद्भिज्जोंमें ही अन्तर्भाव होगा, क्योंकि ऐसा माननेपर ही 'तीन ही बीज हैं' यह निश्चय उत्पन्न हो सकता है ॥ १ ॥ |


सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥२॥

उस इस [ 'सत्' नामक ] देवताने ईक्षण किया, 'मैं इस जीवात्म-रूपसे' इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ' ॥ २ ॥

| सेयं प्रकृता सदाख्या तेजोऽबन्नयोनिर्देवतैक्षतैक्षितवती यथापूर्वं बहु स्यामिति । तदेव | उस इस सत् नामक तेज, जल और अन्नके योनिभूत उपर्युक्त देवताने, जैसा कि पहले ईक्षण किया था कि 'मैं बहुत हो जाऊँ' उसी प्रकार, ईक्षण किया। वह |

| खण्ड ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ |
| :--- | :--- |


| बहुभवनं प्रयोजनं नाद्यापि निर्वृत्तमित्यत ईक्षां पुनः कृतवती बहुभवनमेव प्रयोजनमुररीकृत्य । | बहुत होनारूप प्रयोजन अभीतक समाप्त नहीं हुआ था, इसलिये बहुत होनारूप प्रयोजनको ही मनमें रखकर उसने फिर ईक्षण किया । |
| कथम् ? हन्तेदानीमहमिमा यथोक्तास्तेजआद्यास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनेति स्वबुद्धिस्थं पूर्वसृष्ट्यनुभूतप्राणाधारणमात्मानमेव स्मरन्त्याहानेन जीवेनात्मनेति । प्राणधारणकर्त्रात्मनेति वचनात्स्वात्मनोऽव्यतिरिक्तेन चैतन्यस्वरूपतया विशिष्टेनेत्येतद्दर्शयति । अनुप्रविश्य तेजोऽबन्नभूतमात्रासंसर्गेण लब्धविशेषविज्ञाना सती नाम च रूपं च नामरूपे व्याकरवाणि विस्पष्टमाकरवाण्यसौ नामायमिदरूप इति व्याकुर्यामित्यर्थः । | किस प्रकार ईक्षण किया ? 'अब मैं इन उपर्युक्त तेज आदि तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे—ऐसा कहकर श्रुति पूर्वसृष्टिमें अनुभूत प्राणधारी आत्माका स्मरण करती हुई ही कहती है कि इस जीवात्मरूपसे—प्राण धारण करनेवाले आत्माके द्वारा—इस कथनसे श्रुति यह दिखलाती है कि अपने आत्मासे अभिन्न अर्थात् चैतन्यस्वरूपतया आत्मासे अविशिष्ट जीवरूपसे अनुप्रवेश कर अर्थात् तेज, अप् और अन्न इन भूतमात्राओंके संसर्गसे, जिसने विशेष विज्ञान प्राप्त किया है, ऐसा होकर मैं नामरूप–नाम और रूपोंका व्याकरण–व्यक्तीकरण करूँ; अर्थात् यह इस नामवाला है और इस रूपका है—ऐसा अभिव्यक्त करूँ ।' |
| ननु न युक्तमिदमसंसारिण्याः सर्वज्ञाया देवताया बुद्धिपूर्वकमनेकशतसहस्रानर्थाश्रयं | शङ्का—किंतु स्वतन्त्रता रहते हुए भी असंसारी सर्वज्ञ देवताका बुद्धिपूर्वक ऐसा संकल्प करना कि, सैकड़ों-हजारों अनर्थोंके |