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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| स्मरण्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्” (गीता ८।६) इत्यादि। यत एवं व्यवस्था शास्त्रदृष्टातः स एवं जानन्क्रतुं कुर्वीत यादृशं क्रतुं वक्ष्यामस्तम्। यत एवं शास्त्रप्रामाण्यादुपपद्यते क्रत्वनुरूपं फलम्, अतः स कर्तव्यः क्रतुः ॥ १ ॥ | जिस भावको स्मरण करता हुआ अन्तमें शरीर त्यागता है [उसी-उसी भावको प्राप्त होता है]” क्योंकि ऐसी व्यवस्था शास्त्रप्रतिपादित है, अतः इस प्रकार जाननेवाला वह पुरुष क्रतु करे—जिस प्रकारका क्रतु हम बतलाते हैं, वैसा ही क्रतु करे। क्योंकि इस प्रकार शास्त्रप्रामाण्यसे निश्चयके अनुरूप ही फल मिलना सिद्ध होता है, इसलिये उसे वह निश्चय करना चाहिये ॥ १ ॥ |

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समग्र ब्रह्ममें आरोपित गुण

कथम् ?किस प्रकार निश्चय करना चाहिये ?

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥

[ वह ब्रह्म ] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसंकल्प, आकाशशरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सम्पूर्ण जगत्‌को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है ॥ २ ॥

मनोमयो मनःप्रायः, मनुतेऽनेनेति मनस्तत्स्ववृत्त्या विष-मनोमय—मनःप्राय; जिसके द्वारा जीव मनन करता है उसे मन कहते हैं, यह अपनी वृत्तिद्वारा

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
येषु प्रवृत्तं भवति, तेन मनसा तन्मयः; तथा प्रवृत्त इव तत्प्रायो निवृत्त इव च। अत एव प्राणशरीरः प्राणो लिङ्गात्मा विज्ञानक्रियाशक्तिद्वयसंमूर्च्छितः; “यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः” (कौ० उ० ३। ३) इति श्रुतेः। स शरीरं यस्य स प्राणशरीरः, “मनोमयः प्राणशरीरनेता” (मु० उ० २। २। ७) इति च श्रुत्यन्तरात्।विषयोंमें प्रवृत्त हुआ करता है। उस मनके कारण वह मनोमय है; अतः पुरुष मनःप्राय होकर मनके प्रवृत्त होनेपर प्रवृत्त-सा होता है और निवृत्त होनेपर निवृत्त-सा हो जाता है। इसीलिये वह प्राणशरीर है, “जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वह प्राण है” इस श्रुतिके अनुसार विज्ञान और क्रिया इन दो शक्तियोंसे मिलकर बना हुआ लिङ्गशरीर ही प्राण है; वह प्राण जिसका शरीर है उसे प्राणशरीर कहते हैं; जैसा कि “आत्मा मनोमय और प्राणरूप शरीरको [अन्य देहमें] ले जानेवाला है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है।
भारूपः, भा दीप्तिश्चैतन्यलक्षणं रूपं यस्य स भारूपः। सत्यसंकल्पः, सत्या अवितथाः संकल्पा यस्य सोऽयं सत्यसंकल्पः। न यथा संसारिण इवानैकान्तिकफलः संकल्प ईश्वरस्येत्यर्थः। अनृतेन मिथ्याफलत्वहेतुना प्रत्यूढत्वात्संकल्पस्य मिथ्याफलत्वम्। वक्ष्यति— ‘अनृतेन हि प्रत्यूढाः’ इतिभारूप—भा—दीप्ति अर्थात् चैतन्य ही जिसका रूप है उसे भारूप कहते हैं। सत्यसंकल्प— जिसके संकल्प सत्य यानी अमिथ्या हैं वह यह ब्रह्म सत्यसंकल्प है। तात्पर्य यह है कि संसारी पुरुषके समान ईश्वरका संकल्प अनैकान्तिक (कभी हो, कभी न हो ऐसे) फलवाला नहीं है। संसारी जीवका संकल्प अनृत अर्थात् मिथ्या फलरूप हेतुसे प्रत्यूढ—वृद्धिको प्राप्त होनेके कारण मिथ्या फलवाला होता है। ‘वे अनृतसे प्रत्यूढ हैं’ ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी।